-बाबूलाल शर्मा ‘प्रेम’
कभी में रह के भी घर पर नहीं हूँ,
जहाँ मैं हूँ वहाँ अक्सर नहीं हूँ।
किसी को ठेस क्या मुझसे लगेगी,
किसी की राह का पत्थर नहीं हूँ।
गुलों से है मेरा रिश्ता पुराना,
बहारों का भले शायर नहीं हूँ।
तुम्हारे दर्द का अहसास हूँ मैं,
महज अपनी व्यथा का स्वर नहीं हूँ।
कोई दर तो खुला मेरे लिए भी,
ये क्या कम है कि मैं बेघर नहीं हूँ।
किसी के प्यार की पहचान हूँ मैं,
किसी की पीर का मंज़र नहीं हूँ।
ज़हर संसार का पी लूँ अकेले,
मगर मजबूर हूँ शंकर नहीं हूँ।
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4 टिप्पणियॉं:
बहुत ही दिलकश अभिव्यक्ति. मन प्रसन्न हो गया.
अच्छी ग़ज़ल !
किसी के प्यार की पहचान हूँ मैं,
किसी की पीर का मंज़र नहीं हूँ।.....खुबसूरत अल्फाजों में पिरोये जज़्बात....शानदार |
कोई दर तो खुला मेरे लिए भी,
ये क्या कम है कि मैं बेघर नहीं हूँ।
khoobsurat rachna
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