
तुम्हें छूकर लौट आया दिन।
तुम्हें
छूकर
लौट आया दिन।
अनमना-सा
हो गया-
ये इन्द्रधनुषी मन।
कुछ दरारें
बन गईं
जो जुड़ नहीं पायीं
कुछ नयी दीवार हैं
जो हट नहीं पायीं
अब दूर तक
अंधी गुफाओं में,
ढूंढता,
झख मारता है मन।
फैशन
अधुनातन नहीं,
बाज़ार सी आँखें
अब नहीं
मुझको बुलातीं
गुलमोहर शाखें
हम सफाई
ना भी दें
तो क्या-
टूटता
मन मारता है प्रश्न।
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16 टिप्पणियॉं:
कुछ दरारें
बन गईं
जो जुड़ नहीं पायीं
कुछ नयी दीवार हैं
जो हट नहीं पायीं
अब दूर तक
अंधी गुफाओं में,
ढूंढता,
झख मारता है मन।... bahut badhiya
बढ़िया प्रस्तुति
Gyan Darpan
.
भावपूर्ण कविता के लिए आभार...
Bahut sundar geet racha hai.
मन के भावो को बखूबी उकेरा है।
क्या कहने, बहुत बढिया।
मन को छू लेने वाली रचना
Sundar
www.poeticprakash.com
बहुटी ही भावात्मक लिखा है ... प्रेम जी की रचना से मिलवाने का शुक्रिया ..
कुछ दरारें
बन गईं जो जुड़ नहीं पायीं
कुछ नयी दीवार हैं
जो हट नहीं पायीं
अब दूर तक
अंधी गुफाओं में,
ढूंढता,
झख मारता है मन......बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति।
कुछ दरारें
बन गईं जो जुड़ नहीं पायीं
कुछ नयी दीवार हैं
जो हट नहीं पायीं
अब दूर तक
अंधी गुफाओं में,
ढूंढता,
झख मारता है मन......बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति।
कुछ दरारें
बन गईं जो जुड़ नहीं पायीं
कुछ नयी दीवार हैं
जो हट नहीं पायीं
अब दूर तक
अंधी गुफाओं में,
ढूंढता,
झख मारता है मन......बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति।
टूटता मन मारता है प्रश्न वाह बहुत खूब॥गहन विचारों से युंक्त बढ़िया रचना॥समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति।
कुछ नयी दीवार हैं
जो हट नहीं पायीं
अब दूर तक
अंधी गुफाओं में,
ढूंढता,
झख मारता है मन।
सुन्दर अभिव्यक्ति
सादर,,,
तुम्हें
छूकर लौट आया दिन।अनमना-सा हो गया-ये इन्द्रधनुषी मन।
bahut achchi lagi......
Very Nice post our team like it thanks for sharing
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