
डॉ0 प्रेम शंकर
आ गया है
चैत,
सोने-सी पकी फसलें।
दो घड़ी
हम आम तरु की
छाँह में हंस लें।
पोखरे का
जल गंदीला
मछलियाँ प्यासी
ये
किसानी आँख
मानो,
अनधुली बासी
कह रही ज्यों
हम कहाँ,
किस ठौर जा बस लें।
लादकर
गट्ठर समय का
एक युग बीता
आदमी ने
मौत को
अब तक नहीं जीता
इसलिए हम
हाथ में हंसिया
जरा कस लें।
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17 टिप्पणियॉं:
डॉ0 साहब के नवगीतों का जवाब नहीं। नयी उपमाएं और नये बिम्ब, सीधे मन में उतर जाते हैं।
सुरेश भ्रमर
बहुत सुंदर प्रस्तुति आभार ...समय मिले कभी तो आयेगा मृ पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/
गांव की माटी की गंध से सुवासित सुंदर नवगीत। हार्दिक बधाई।
साधना गौतम, अलीगढ़
गांव की माटी की गंध से सुवासित सुंदर नवगीत। हार्दिक बधाई।
साधना गौतम, अलीगढ़
nice
nice
कल 28/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
अंतिम पंक्तियाँ आज की सच्चाई हैं ......
डा०साहब,..
बहुत खूब..तरीफेकाबिल बेहतरीन पोस्ट..
मेरे पोस्ट 'शब्द'में आपका इंतजार है ,..
वाह ...बहुत बढि़या।
sundar abhivyakti..
लादकर
गट्ठर समय का
एक युग बीता
आदमी ने
मौत को
अब तक नहीं जीता
इसलिए हम
हाथ में हंसिया
जरा कस लें।
बहुत खूबसूरत शब्दों से सजी सुन्दर रचना अपनी बात में बहुत कुछ कहना बहुत सुन्दर अंदाज़ |
बहुत बढ़िया नवगीत पढवाने के लिए ...
सादर आभार....
बहुत अच्छी प्रस्तुति
सुन्दर रचना.....
बहुत सुंदर भावों से बेहतरीन रचना....
ठेठ गाँव की कविता. गाँव सी ही सहजता.
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