-डॉ0 नरेश कात्यायन
चले आओ तुम्हारी सल्तनत तुमको दिखानी है।
हमारा दिल तुम्हारी चाहतों की राजधानी है।
तुम्हारे बिन यहाँ तुलसी के पत्ते हो गये पीले,
तुम्हारे बिन यहाँ कुम्हला रही अब रात रानी है।कहीं यह तोड़कर संयम न दुनिया में भटक जाये,
हमारी प्यास की लड़की हुई जाती सयानी है।किसी ऋषि की सुता के हाथ अपनी चाहतें देकर,
कोई दुष्यंत ही इस बार खो बैठा निशान है।हमारी प्यास है या एक तृष्णा का समंदर है,
वर्ना खुश्क आँखों में कई नदियों का पानी है।हजारों साल से जिसके लिए तड़पे अधर मेरे,
तुम्हारी वह गजल अब इस जमाने को सुनानी है।बहुत चाहा मगर सब कुछ गजल में कह नहीं पाया,
जरूरी बात तो अधरों को अधरों से बतानी है। | अगर आपको 'हमराही' का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ। |
|---|



13 टिप्पणियॉं:
बहुत खूब ..
आपको दीपावली की शुभकामनाएं !!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति |
दीवाली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ|
लाजवाब गज़ल। दीवाली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ|
बहुत खूब सर!
आपको सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
सादर
गज़ब की गज़ल है……………दीपावली पर्व अवसर पर आपको और आपके परिवारजनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं
दीपावली केशुभअवसर पर मेरी ओर से भी , कृपया , शुभकामनायें स्वीकार करें
हजारों साल से जिसके लिए तड़पे अधर मेरे,
तुम्हारी वह गजल अब इस जमाने को सुनानी है।
बहुत चाहा मगर सब कुछ गजल में कह नहीं पाया,
जरूरी बात तो अधरों को अधरों से बतानी है।
बेहतरीन प्रस्तुति .नए अंदाज़ और आगाज़ की ग़ज़ल .मुबारक इस ग़ज़ल सी दिवाली .
बहुत सुन्दर!
आपको और आपके पूरे परिवार को
दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
आपकी पोस्ट की हलचल आज (29/10/2011को) यहाँ भी है
सुन्दर प्रस्तुति
वाह ...बहुत बढि़या।
ekdam alag sa....bahut sunder.....चले आओ तुम्हारी सल्तनत तुमको दिखानी है।
हमारा दिल तुम्हारी चाहतों की राजधानी है।
क्या बात है, बहुत सुंदर
एक टिप्पणी भेजें