रामबली का कहना है, थोड़े दिन दु:ख सहना है।
ऊँची-ऊँची भव्य कोठियाँ झोपडियों को चिढ़ा रही हैं
जाने कितने इंसानो को फुटपाथों पे सुला रही हैं
रामबली कारीगर को भी कच्चे घर में रहना है।
आसमान की उड़ती चीलें चूजों को खा जाती हैं
पोखर की नादान मछलियाँ जाल देख भय खाती हैं
डर-दहशत तो रामबली की बिटिया का भी गहना है।
राजाओं के दरबारों को पूँजीवादी सरकारों को
सहमी-सहमी दीवारों को दुख की ऊँची मीनारों को
रामबली का कहना है इनको आज नहीं कल ढ़हना है।
-शिवचरण बन्धु
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3 टिप्पणियॉं:
बहुत अच्छी कविता है. रामबली का कल के प्रति भरोसा ही इसकी जान है. कविता में दिल छू लेने वाली ध्वन्यात्मकता है, बधाई
बहुत अच्छे से आपने अपनी कविता में शब्दों और भावों को पिरोया है। बढ़िया प्रस्तुति समय मिले टोकभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/10/blog-post_13.html
Sir, Waah kya baat hai...Aapki in panktiyon me samaj ki sachhayi nazar ati hai..Bahot khoob.
Kabhi waqt mile to hamare blog pe bhi avashya padharen.aap ka swagat hai,
http://zindagi-ek-dard.blogspot.com/ par
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