...खींच लो जुबान उसकी

-रमेश तैलंग
आस-पास नज़र रखो
लोगों की खबर रखो
कौन अजनबी कहां घात है लगा रहा.
सावधान, वक्त आज तुमको जगा रहा.

छोड़कर निशानियां
फूट की. जो आए दिन,
गढ़ रहे कहानियां
झूठ की जो आए दिन,
उनका चिटठा खोलो,
क्या है सच्चा, बोलो,
खींच लो जुबान उसकी जो है बरगला रहा.
सावधान. वक्त आज तुमको जगा रहा.

पथ है अनजाना तो
कुछ डर भी होंगे ही,
हर सवाल के लेकिन
उत्तर भी होंगे ही,

जिन्हें तुम्हे पाना है,
हौसला बनाना है,
कन्धों पर भार तुम्हारे है अब आ रहा.
सावधान, वक्त आज तुमको जगा रहा!
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10 टिप्‍पणियॉं:

Sunil Kumar ने कहा…

सुबह सुबह अच्छी रचना पढ़वाने के लिए आभार

mahendra srivastava ने कहा…

क्या कहने, बहुत सुंदर
तैलंग जी की अच्छी रचना हम तक पहुंचाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

कुमार राधारमण ने कहा…

बच्चों के लिए ऐसी कविताएं कम ही पढ़ी हैं। अक्सर तो प्रार्थना में भी उन्हें अपराधी होने का अहसास कराया जाता है।

veerubhai ने कहा…

आस-पास नज़र रखो
लोगों की खबर रखो
कौन अजनबी कहां घात है लगा रहा.
सावधान, वक्त आज तुमको जगा रहा.

छोड़कर निशानियां
फूट की. जो आए दिन,
गढ़ रहे कहानियां
झूठ की जो आए दिन,
उनका चिटठा खोलो,
क्या है सच्चा, बोलो,
खींच लो जुबान उसकी जो है बरगला रहा.
सावधान. वक्त आज तुमको जगा रहा.

पथ है अनजाना तो
कुछ डर भी होंगे ही,
हर सवाल के लेकिन
उत्तर भी होंगे ही,

जिन्हें तुम्हे पाना है,
हौसला बनाना है,
कन्धों पर भार तुम्हारे है अब आ रहा.
सावधान, वक्त आज तुमको जगा रहा!
बच्चों को चेताती वीर -भाव और सजगता पैदा करती रचना .आभार .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुंदर रचना पढ़वाने के लिए आभार!

Bhushan ने कहा…

बहुत सुंदर कविता जो जगाने का कार्य करती है.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

रमेश तैलंग जी की सुन्दर वैचारिक रचना पढ़वाने के लिए आभार...

anu (anju choudhary) ने कहा…

वाह ....बहुत खूब ...ब्लोगिंग शुरू करते ही ...बहुत अच्छी रचना पढने को मिली ...आभार आपका

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

bahut sundar

रमेश तैलंग ने कहा…

सभी सुविग्य जनों के प्रति मेरा दृदय से आभार. आप सब का स्नेह/प्रोत्साहन मुझे रचनात्मक बल देता है. -रमेश तैलंग