-पुष्पा ‘सुमन’
सारा मौसम बदल दिया है कुछ बदचलन हवाओं ने।
नदियों पर पानी बरसाया, फिर मनचली घटाओं ने।
रिश्तों की इस तंग गली में जब भी गुजरे, टूटे हैं,
सपनों का जल सोख लिया है रेतीले सहराओं ने।
सिर्फ धरा ही नहीं गगन में भी कुछ दर्पण दरके हैं,
यह संवाद सुना भू पर टूट गिरी उल्काओं ने।
शकुनि ने पासे फेंके, मारी स्वर्णमृग बना हुआ,
बदला है इतिहास सदा ही मायावी मामाओं ने।
किसके आगे त्यागी लिख दें, किसके आगे बलिदानी,
’पुष्पा’ सबको मोल ले लिया, सत्ता ने, सुविधाओं ने।
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10 टिप्पणियॉं:
सबको मोल लिया , सत्ता ने सुविधाओं ने !
सत्य वचन!
किसे आगे त्यागी लिख दें, किसके आगे बलिदानी,
’पुष्पा’ सबको मोल ले लिया, सत्ता ने, सुविधाओं ने।
किसके आगे त्यागी लिखदें ,किसके आगे बलिदानी में ...कृपया किसे कि जगह किसके करलें .सुन्दर बेहद अर्थ गर्भित रचना के लिए बधाई .
अनमोल..
पहले तो में आप से माफ़ी चाहता हु की में आप के ब्लॉग पे बहुत देरी से पंहुचा हु क्यूँ की कोई महताव्पूर्ण कार्य की वजह से आने में देरी हो गई
आप मेरे ब्लॉग पे आये जिसका मुझे हर वक़त इंतजार भी रहता है उस के लिए आपका में बहुत बहुत आभारी हु क्यूँ की आप भाई बंधुओ के वजह से मुझे भी असा लगता है की में भी कुछ लिख सकता हु
बात रही आपके पोस्ट की जिनके बारे में कहना ही मेरे बस की बात नहीं है क्यूँ की आप तो लेखन में मेरे से बहुत आगे है जिनका में शब्दों में बयां करना मेरे बस की बात नहीं है
बस आप से में असा करता हु की आप असे ही मेरे उत्साह करते रहेंगे
बहुत लाजवाब गज़ल ... आज के संधर्भ में सटीक ... शुक्रिया इस गज़ल का ...
किसके आगे त्यागी लिख दें, किसके आगे बलिदानी,
’पुष्पा’ सबको मोल ले लिया, सत्ता ने, सुविधाओं ने।
सिर्फ धरा ही नहीं गगन में भी कुछ दर्पण दरके हैं,
यह संवाद सुना भू पर टूट गिरी उल्काओं ने।
रचना नित नूतन सौन्दर्य संजोये है प्रियतमा से हर दम ताज़ा सद्य स्नाता सी अर्थपूर्ण ,.....
बहुत ही शानदार पंक्तिया हैं समसामयिक
:)
जाकिर जी नमस्कार्। सुन्दर सटीक पंक्तिया वर्तमान व्यव्स्था पर धन्यवाद्। मेरे ब्लाग पर आपका स्वागत है।
विडम्बनाओं का बहुत ही मर्मस्पर्शी चित्रण ....
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