धीरे-धीरे ले गया मेरी जवानी छीनकर...
-डॉ0 अनीता श्रीवास्तव
एक बच्चा बादलों को
पानी दे गया
मेरी प्यासी जड़ों को
जिन्दगानी दे गया
डाकिया इस बार जब आया
चिट्ठियों के साथ कुछ
यादें पुरानी दे गया
राम जाने कौन था
एक पल ठहरा नहीं
दर्द लेकिन जाते-जाते
खानदानी दे गया
उम्र भर क्या-क्या कमाया
जब मैंने उससे पूछा
पोटली में बाँधकर
किस्से-कहानी दे गया
धीरे-धीरे ले गया
मेरी जवानी छीनकर
और बदले में मुझे
अपनी निशानी दे गया
मेरी खुशियों के इलाके को
ले गया छीनकर
और समझौते में
गम की राजधानी दे गया।
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6 टिप्पणियॉं:
uf ........behad marmsparshi rachana.
लाजवाब!
बहुत सुन्दर, धन्यवाद|
Achchhi rachana k liye Rajnish ji evam lekhika dono ko sadhuvad.Dr.Dinesh pathak shashi.Mathura.
मर्मस्पशी रचना दिल को छु गई वाह!
पहली बार आपके ब्लाग पर हूं..
बहुत अच्छी रचना,
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