ज़माना इसलिए नाराज़ मुझसे, किसी को प्‍यार कर बैठा हुआ हूँ।



-चंद्रभान भारद्वाज

नदी को पार कर बैठा हुआ हूँ।
सभी कुछ हार कर बैठा हुआ हूँ।

मिले बिन मान के ऐश्‍वर्य सारे,
उन्‍हें इनकार कर बैठा हुआ हूँ।

मना पाया न रूठी जिंदगी को,
बहुत मनुहार कर बैठा हुआ हूँ।

मुझे मंझधार में जो छोड़ आया,
उसे मैं तार कर बैठा हुआ हूँ।

उधर सब मन की मर्जी कर रहे हैं,
इधर मन हार कर बैठा हुआ हूँ।

बिना अपराध के भी हर सज़ा को,
सहज स्‍वीकार कर बैठा हुआ हूँ।

ज़माना इसलिए नाराज़ मुझसे,
किसी को प्‍यार कर बैठा हुआ हूँ।

अंधेरा हो न भारद्वाज हावी,
दिया तैयार कर बैठा हुआ हूँ।
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8 टिप्‍पणियॉं:

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति,गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें

पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" ने कहा…

bhtrin gzaal............akhtar khan akela kota rajstan

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति....

ana ने कहा…

pankti pankti ati sundar......abhar

राकेश कौशिक ने कहा…

"बिना अपराध के भी हर सज़ा को,
सहज स्‍वीकार कर बैठा हुआ हूँ।

...

अंधेरा हो न ‘भारद्वाज’ हावी,
दिया तैयार कर बैठा हुआ हूँ"

वाह वाह - अप्रतिम - आभार

Maheshwari kaneri ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति.......

सुमन'मीत' ने कहा…

bahut sundar rachna

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

bahut hee sundar rachna