देह पर पट्टियाँ तो कम लेकिन, मन के भीतर का घाव ज्‍यादा है।


-सुधांशु उपाध्‍याय

तेज लहरें भी टूट जाती हैं, इस नदी में घुमाव ज्‍यादा है।
प्‍यार के शब्‍द अटपटे लगते, इन दिनों कुछ तनाव ज्‍यादा है।

लाफ्टर शो भी ये हंसा नहीं पाते, मन में कुछ भी बसा नहीं पाते
सारे रिश्‍ते तितर-बितर होते, कोई बंधन कसा नहीं पाते
देह पर पट्टियाँ तो कम लेकिन, मन के भीतर का घाव ज्‍यादा है।

एक चिडि़या है भीगे पर वाली, गाँव की होगी या शहर वाली
घर के कोने में आ के बैठी है, यूँ कहें कि है वो घर वाली
पंख में उसके उड़ान दुबकी है ठण्‍ड का लेकिन जमाब ज्‍यादा है।

होश में रहना भी आज मुश्किल है, एक उजड़ी हुई सी महफिल है
नीम के पीछे छिपा है चाँद आकर, घर की¡ खाली हरेक मंजिल है
दूरियाँ तो कुछ नहीं लेकिन, इस गली में पड़ाव ज्‍यादा है।

बस्तियाँ हैं तो बस्तियों जैसी, कश्तियाँ भी हैं कश्तियों जैसी
रेत में छटपटा रहीं कई चीजें, सबकी सूरत है मछलियों जैसी
अब तो रिश्‍ता नहीं कोई उनसे, फिर उनसे लगाव ज्‍यादा है।
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5 टिप्‍पणियॉं:

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बढ़िया रचना
way4host

निर्मला कपिला ने कहा…

एक चिडि़या है भीगे पर वाली, गाँव की होगी या शहर वाली
घर के कोने में आ के बैठी है, यूँ कहें कि है वो घर वाली
पंख में उसके उड़ान दुबकी है ठण्‍ड का लेकिन जमाब ज्‍यादा है।
सुधाँशू जी की रचना बहुत अच्छी लगी। धन्यवाद।

निर्मला कपिला ने कहा…

एक चिडि़या है भीगे पर वाली, गाँव की होगी या शहर वाली
घर के कोने में आ के बैठी है, यूँ कहें कि है वो घर वाली
पंख में उसके उड़ान दुबकी है ठण्‍ड का लेकिन जमाब ज्‍यादा है।
सुधाँशू जी की रचना बहुत अच्छी लगी। धन्यवाद।

veerubhai ने कहा…

जीवन की अन्य मनस्क्ता और उजड़े मन पर सटीक टिपण्णी .आज कुछ जीवन ऐसा ही है .रस लेना ना -मुमकिन सा हो गया है अन्दर तो मन रीता है .सुधांशु जी की बहुत बेहतर रचना जाकिर साहब आपने पढवाई .दोनों को बधाई .

veerubhai ने कहा…

जीवन की अन्य मनस्क्ता और उजड़े मन पर सटीक टिपण्णी .आज कुछ जीवन ऐसा ही है .रस लेना ना -मुमकिन सा हो गया है अन्दर तो मन रीता है .सुधांशु जी की बहुत बेहतर रचना जाकिर साहब आपने पढवाई .दोनों को बधाई .