घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है?
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी,
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।
बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में,
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे,
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।
| अगर आपको 'हमराही' का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ। |
|---|


11 टिप्पणियॉं:
इतनी लाजवाब गज़ल्! वाह मै तो ये नही समझ पा रही कि किस शेर को कहूँ कि सब से अधिक अच्छा है? हर एक शेर अद्भुत सुन्दर दिल को छूने वाला है। बधाई
निर्मल जी ने मेरे दिल की बात कह दी………………किसकी तारीफ़ करूँ और किसे छोडूँ…………सीधे दिल मे उतर गयी………………बेहद मार्मिक चित्रण्।
बहुत खूब रजनीश जी लाजवाब ग़ज़ल के लिया बधाई
lajwab
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है?
वाह....!!
हर she'r lajwaah .....!!
बहुत ही ख़ूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल लिखा है आपने! बधाई!
bahut shandaar gahazal hai :)
Ati Sundar.
zakir bhai ,aapko bahut bahut dhanyvad,is sakaratmak tippani ke liye.
sasneh ,
dr.bhoopendra
jeevansandarbh.blogspot.com
jakir ji,aapki gazal bahut -bahut khoobsurat tatha dil ko chhune wali hai.lagta hai ek ek shabd sachchai ko bayan kar rahe hain.
poonam
bahut lajawab!
एक टिप्पणी भेजें