सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे, मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।

-अदम गोंडवी-

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है?

भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी,
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में,
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे,
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।

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11 टिप्‍पणियॉं:

निर्मला कपिला ने कहा…

इतनी लाजवाब गज़ल्! वाह मै तो ये नही समझ पा रही कि किस शेर को कहूँ कि सब से अधिक अच्छा है? हर एक शेर अद्भुत सुन्दर दिल को छूने वाला है। बधाई

वन्दना ने कहा…

निर्मल जी ने मेरे दिल की बात कह दी………………किसकी तारीफ़ करूँ और किसे छोडूँ…………सीधे दिल मे उतर गयी………………बेहद मार्मिक चित्रण्।

राकेश कौशिक ने कहा…

बहुत खूब रजनीश जी लाजवाब ग़ज़ल के लिया बधाई

muskan ने कहा…

lajwab

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है?

वाह....!!

हर she'r lajwaah .....!!

Babli ने कहा…

बहुत ही ख़ूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल लिखा है आपने! बधाई!

Parul ने कहा…

bahut shandaar gahazal hai :)

अमृत ने कहा…

Ati Sundar.

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह ने कहा…

zakir bhai ,aapko bahut bahut dhanyvad,is sakaratmak tippani ke liye.
sasneh ,
dr.bhoopendra
jeevansandarbh.blogspot.com

JHAROKHA ने कहा…

jakir ji,aapki gazal bahut -bahut khoobsurat tatha dil ko chhune wali hai.lagta hai ek ek shabd sachchai ko bayan kar rahe hain.
poonam

अल्पना वर्मा ने कहा…

bahut lajawab!