ऐसी मंहगाई की सरगम को ग़ज़ल कहते हैं।

-सुधाकर अदीब-

न पूछ यार मेरे किसको ग़ज़ल कहते हैं,
दर्द के शोलों पे चलने को ग़ज़ल कहते हैं।

महल की छत पे जहाँ झोपड़ों की बात चले,
वहाँ रोशन हुई शमा को ग़ज़ल कहते हैं।

जिसे सारा शहर हर वक्त गुनगुनाता है,
ऐसी मंहगाई की सरगम को ग़ज़ल कहते हैं।

भूख के पैरों सरे शाम जो बंध जाते हैं,
ऐसे बेचारे घुघरूओं को ग़ज़ल कहते हैं।

सड़क चौराहों पर दिन-रात जो रूलाती है,
भीड़ में खोई कहानी को ग़ज़ल कहते हैं।
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9 टिप्‍पणियॉं:

बेनामी ने कहा…

सच का आईना दिखाती ग़ज़ल।

-श्वेता तिवारी।

Kuunu ने कहा…

Adeeb ji, is shandar Ghazal ke liye Badhayi sweekaren.

वन्दना ने कहा…

waah...........gazab ki gazal hai ...........aaina dikhati huyi aaj ke samaaj ko .

Arshia ने कहा…

Nice Ghazal.

गिरिजेश राव ने कहा…

@ जिसे सारा शहर हर वक्त गुनगुनाता है,
ऐसी मंहगाई की सरगम को ग़ज़ल कहते हैं।
सड़क चौराहों पर दिन-रात जो रूलाती है,
भीड़ में खोई कहानी को ग़ज़ल कहते हैं।

ये कलम मुझे दे दे ज़ाकिर !

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

भूख के पैरों सरे शाम जो बंध जाते हैं
ऐसे बेचारे घुघरूओं को ग़ज़ल कहते हैं
बहुत बढ़िया प्रस्तुति . बधाई ....

Amitraghat ने कहा…

nice post......"
amitraghat.blogspot.com

संजय भास्कर ने कहा…

आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपकी संवेदनात्‍मक अभिव्‍यक्तियां प्रत्‍येक व्‍यक्ति के साहित्यिक धरातल को आत्‍मीयता से स्‍पर्श करने में अपना वर्चस्‍व सहजता से स्‍थापित करने में सफल सिद्ध हुई है । इनको पढ़ने के बाद मेरा भी मन उमड़ धुमड़ कर आवारा बादलों की तरह वरस जाना चाहता है । धन्‍यवाद