पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है कागज
बच्चों की फटी कापियों का
चना जोर गरम के लिफाफे बनाने के पहले!
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद!
सुना गया हमको
यों ही उडते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठासाठस्स ठुंसी हुई बस में!
भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के
दुख की तरह
एक दिन हमने कहा
हम भी इंसान हैं-
हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी0ए0 के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन।
देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग।
सुनो हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा।
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियां उड़ीं और रंगीन अफवाहें
चीखती हुई चीं-चीं
'दुश्चरित्र महिलाएँ, दुश्चरित्र महिलाएँ-
किन्ही सरपरस्तों के दर पर फूली-फैली
अगरधत्त जंगली लताएँ।
खाती-पीती, सुख से उबी
और बेकार बेचैन, आवारा महिलाओं का ही
शगल हैं ये कहानियाँ और कविताएं...।फिर ये उन्होंने थोड़े ही लिखी हैं
(कनखियाँ, इशारे, फिर कनखी)
बाकी कहानी बस कनखी है।
हे परम पिताओ,
परमपुरूषो,
बख्शो, वख्शो, अब हमें बख्शो!
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10 टिप्पणियॉं:
अपने मनोभावो को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं...सुन्दर रचना है बधाई।
ये स्वकीया है ?
jahir ji anamika ji hamari aadrsh hain ! aap bhi unse sahmat hain !
hme achha laga !dhnywad !
Mastishk ko hila ke rakh diya.
यह एक बहुत सशक्त कविता है. बेहद प्रभावशाली और समाज को बयाँ करती हुई .
बहुत सशक्त रचना है नारी की त्रास्दी पर । धन्यवाद और शुभकामनायें
कठोर सच्चाई का सामना कराती कविता
Gehra prbhav chodti hui rachna.
सटीक सशक्त कविता है बधाई
koob sunder .
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