अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी, उस से ज़रा सा राब्त बढ़ाना बहुत हुआ।

-अहमद फराज़-

उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ।
अब क्या कहें ये किस्सा पुराना बहुत हुआ।

ढ़लती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़,
ए मर्ग - ए - नगाहाँ तेरा आना बहुत हुआ।

हम खुल्द से निकल तो गये हैं, पर ऐ खु़दा,
इतने से वाक्ये का फ़साना बहुत हुआ।

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी,
उस से ज़रा सा राब्त बढ़ाना बहुत हुआ।

अब तक दिल का दिल से तअर्रूफ न हो सका,
माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ।

लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र,
'अहमद फ़राज़' तुझ से कहा न बहुत हुआ।

8 टिप्‍पणियॉं:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

एहमद फ़राज़ साहब की निहायत खोब्सूरत ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा आ गया .........

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

'अहमद फ़राज़' जी को पढवाने का शुक्रिया.

Manoj Verma ने कहा…

Sundar gazal

Sant Ji ने कहा…

Ahmad ji ki gazal hame bha gayi.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी,
उस से ज़रा सा राब्त बढ़ाना बहुत हुआ।



फ़राज़ साहब की बेहतरीन ग़ज़ल पढवाने का तहे दिल से शुक्रिया जाकिर भाई...

नीरज

Udan Tashtari ने कहा…

आनन्द आ गया फ़राज़ साहब की गज़ल पढ़कर. आपका बहुत आभार.

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... शानदार गजल .....प्रस्तुति प्रभावशाली है!!!

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

बढिया गजल पढवाने का शुक्रिया ।
लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र,
'अहमद फ़राज़' तुझ से कहा न बहुत हुआ।
वाह !