मायूस हो गया था नजूमी की बात से, हाथों को उसने थामा मुक़ददर बदल दिया।

-महमूद 'हमसर' अब्बासी-

हमने बड़े सलीक़े से रहबर बदल दिया।
गिरने से पहले छत के ये घर बदल दिया।

ईदुल फितर के रोज़ गले मिल रहे थे सब,
बच्चों की इक लड़ाई ने मंज़र बदल दिया।

छेड़ा था जिक्र ही अभी सुकरात का यहाँ,
साक़ी ने मेरे हाथ का सागर बदल दिया।

मायूस हो गया था नजूमी की बात से,
हाथों को उसने थामा मुक़ददर बदल दिया।

ये भीड़, ये अदालतें, हम परेशां हाल,
ऐसे में एक नोट ने नम्बर बदल दिया।

“हमसर” हमारा हौसला तोड़ा है इस तरह,
यारों ने संगे-मील का पत्थर बदल दिया।

9 टिप्‍पणियॉं:

sada ने कहा…

छेड़ा सा जिक्र ही अभी सुकरात का यहाँ,
साक़ी ने मेरे हाथ का सागर बदल दिया।

बहुत ही सुन्‍दर रचना, आभार ।

Kusum Thakur ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है , धन्यवाद !

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

छेड़ा था जिक्र ही अभी सुकरात का यहाँ,
साक़ी ने मेरे हाथ का सागर बदल दिया।

बेहद खूब, सुन्दर प्रस्तुति !

अजय कुमार ने कहा…

ईदुल फितर के रोज़ गले मिल रहे थे सब,
बच्चों की इक लड़ाई ने मंज़र बदल दिय

सार्थक सोच वाली रचना , बधाई

निर्मला कपिला ने कहा…

पूरी गज़ल ही लाजवाब है मगर एय शे र बहुत पसंद आये
ईदुल फितर के रोज़ गले मिल रहे थे सब,
बच्चों की इक लड़ाई ने मंज़र बदल दिया।

छेड़ा था जिक्र ही अभी सुकरात का यहाँ,
साक़ी ने मेरे हाथ का सागर बदल दिया।
धन्यवाद्

जी.के. अवधिया ने कहा…

"ईदुल फितर के रोज़ गले मिल रहे थे सब,
बच्चों की इक लड़ाई ने मंज़र बदल दिया।"

बेहतरीन!

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

वाह ...
'' ये भीड़, ये अदालतें, हम परेशां हाल,
ऐसे में एक नोट ने नम्बर बदल दिया। ''
सुन्दर लगा ...
शुक्रिया ... ...

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बढ़िया ग़ज़ल...बहुत अच्छा लगा..प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार..

संजय भास्कर ने कहा…

आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com