-महमूद 'हमसर' अब्बासी-
हमने बड़े सलीक़े से रहबर बदल दिया।
गिरने से पहले छत के ये घर बदल दिया।
ईदुल फितर के रोज़ गले मिल रहे थे सब,
बच्चों की इक लड़ाई ने मंज़र बदल दिया।
छेड़ा था जिक्र ही अभी सुकरात का यहाँ,
साक़ी ने मेरे हाथ का सागर बदल दिया।
मायूस हो गया था नजूमी की बात से,
हाथों को उसने थामा मुक़ददर बदल दिया।
ये भीड़, ये अदालतें, हम परेशां हाल,
ऐसे में एक नोट ने नम्बर बदल दिया।
“हमसर” हमारा हौसला तोड़ा है इस तरह,
यारों ने संगे-मील का पत्थर बदल दिया।
...गर्मी को पानी से धोएँ, बारिश को हम खूब सुखाएँ
-
उनका मौसम
देवेन्द्र कुमार
गर्मी को पानी से धोएँ
बारिश को हम खूब सुखाएँ
जाड़े को फिर सेंक धूप से
अपनी दादी को खिलवाएँ।
कैसा भी ...
1 सप्ताह पहले


9 टिप्पणियॉं:
छेड़ा सा जिक्र ही अभी सुकरात का यहाँ,
साक़ी ने मेरे हाथ का सागर बदल दिया।
बहुत ही सुन्दर रचना, आभार ।
बहुत अच्छी रचना है , धन्यवाद !
छेड़ा था जिक्र ही अभी सुकरात का यहाँ,
साक़ी ने मेरे हाथ का सागर बदल दिया।
बेहद खूब, सुन्दर प्रस्तुति !
ईदुल फितर के रोज़ गले मिल रहे थे सब,
बच्चों की इक लड़ाई ने मंज़र बदल दिय
सार्थक सोच वाली रचना , बधाई
पूरी गज़ल ही लाजवाब है मगर एय शे र बहुत पसंद आये
ईदुल फितर के रोज़ गले मिल रहे थे सब,
बच्चों की इक लड़ाई ने मंज़र बदल दिया।
छेड़ा था जिक्र ही अभी सुकरात का यहाँ,
साक़ी ने मेरे हाथ का सागर बदल दिया।
धन्यवाद्
"ईदुल फितर के रोज़ गले मिल रहे थे सब,
बच्चों की इक लड़ाई ने मंज़र बदल दिया।"
बेहतरीन!
वाह ...
'' ये भीड़, ये अदालतें, हम परेशां हाल,
ऐसे में एक नोट ने नम्बर बदल दिया। ''
सुन्दर लगा ...
शुक्रिया ... ...
बढ़िया ग़ज़ल...बहुत अच्छा लगा..प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार..
आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।
Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
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