-शकूर अनवर-
बहुत गहरे हैं उन आँखों के मंज़र।
कहीं देखे नहीं ऐसे समन्दर।
कहाँ जायेंगे हम अपनों से कटकर,
रहेंगी मछनियाँ दरिया के अन्दर।
ज़रा सी जिन्दगी में सुख समेटो,
मिला है ओस को फूलों का बिस्तर।
तुम अपनी असलियत भी खो रहे हो,
मिलेगा क्या तुम्हें चेहरा बदलकर।
तुम्हारी नफ़रतें तुम को मुबारक,
तुम अपने पास रखो अपने ख़ज़र।
बहा ले जायेगा सैलाब “अनवर”,
न रखो आप इतना घर सजाकर।
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10 टिप्पणियॉं:
तुम अपनी असलियत भी खो रहे हो,
मिलेगा क्या तुम्हें चेहरा बदलकर।
सुन्दर रचना
शकूर भाई कि मशहूर ग़ज़ल देख कर सुखद अहसास हुआ। पर इस में मछलियाँ मझनियाँ हो गई हैं, कृपया सुधार दें।
भई इस बहर मे यह बेहतरीन गज़ल है ।
कहाँ जायेंगे हम अपनों से कटकर,
रहेंगी मछनियाँ दरिया के अन्दर
तुम अपनी असलियत भी खो रहे हो,
मिलेगा क्या तुम्हें चेहरा बदलकर।
लाजवाब गज़ल है ये दोनो शेर बहुत पसंद आये आभार्
बहुत गहरे हैं उन आँखों के मंज़र।
कहीं देखे नहीं ऐसे समन्दर।
बहा ले जायेगा सैलाब “अनवर”,
न रखो आप इतना घर सजाकर।
bahut hi behtreen sher ..........dil ko gahrayi tak choo gaye.
शकूर अनवर साहब को पढ़कर आनन्द आ गया.
आप एक से एक रचनाएँ पढ़वाते हैं, बहुत आभार. जारी रहिये.
न रखो आप इतना घर सजाकर।
bahut sunder vyngya hai !
safgoi aur chetawni bhi !
mere blog par bhi swagat hai!
कहाँ जायेंगे हम अपनों से कटकर,
रहेंगी मछनियाँ दरिया के अन्दर।
BAHUT DOOR JAANE WAALI BAT KAHI HAI IS SHER MEIN .... SACH HAI ... JEENA YAHAAN... MARNA YAHAAN...ISKE SIVA....JANA KAHAAN ....
हर शब्द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति ।
Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
हर शब्द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति ।
Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
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