तब से लगने लगा दुनिया भी कुछ रंगीली है।

-डॉ0 सुधाकर अदीब-

जबसे आँसू की जगह थोड़ी मैंने पी ली है।
तब से लगने लगा दुनिया भी कुछ रंगीली है।

तेरे कारिंदे उजले चेहरे लिये फिरते हैं,
उन्हीं के ज़ुल्म से मेरी भी पीठ नीली है।

मेरी फ़रियाद की जानिब हज़ार पत्थर हों,
मेरे मुंसिफ़ की निगाहें अभी शर्मीली हैं।

मेरे ख़तों की स्याही तो कब की सूख चुकी,
तेरे फ़सानों की स्याही अभी भी गीली है।

तुम अपने अहद के शोलों से मत डराओ मुझे,
मेरी ख़ुददारी की तलवार भी नोकीली है।

कभी न ख़त्म हो ये सिलसिला अदावत का,
अब तो लगने लगा ये राह भी नशीली है।

7 टिप्‍पणियॉं:

Nirmla Kapila ने कहा…

कभी न ख़त्म हो ये सिलसिला अदावत का,
अब तो लगने लगा ये राह भी नशीली है।
लाजवाब गज़ल के लिये अदीब जी को बधाई

Manju Srivastava ने कहा…

बहुत प्यारी गजल है। बधाई स्वीकारें।

अजय कुमार ने कहा…

लाजवाब गज़ल के लिये बधाई

Aasif Dehelvi ने कहा…

Adeeb ji, Khoobsoorat Ghazal kahi hai aapne.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

sundar ...
kash aur majtee ...

जी.के. अवधिया ने कहा…

"मेरे ख़तों की स्याही तो कब की सूख चुकी,
मेरे फ़सानों की स्याही अभी भी गीली है।"


बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदलीं
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आँसू बहते हैं

Kavita ने कहा…

तेरे कारिंदे उजले चेहरे लिये फिरते हैं,
उन्हीं के ज़ुल्म से मेरी भी पीठ नीली है।

Zindagi ki talkh sachchaai ko bayaan karta sundar sher.