-डॉ0 सुधाकर अदीब-
जबसे आँसू की जगह थोड़ी मैंने पी ली है।
तब से लगने लगा दुनिया भी कुछ रंगीली है।
तेरे कारिंदे उजले चेहरे लिये फिरते हैं,
उन्हीं के ज़ुल्म से मेरी भी पीठ नीली है।
मेरी फ़रियाद की जानिब हज़ार पत्थर हों,
मेरे मुंसिफ़ की निगाहें अभी शर्मीली हैं।
मेरे ख़तों की स्याही तो कब की सूख चुकी,
तेरे फ़सानों की स्याही अभी भी गीली है।
तुम अपने अहद के शोलों से मत डराओ मुझे,
मेरी ख़ुददारी की तलवार भी नोकीली है।
कभी न ख़त्म हो ये सिलसिला अदावत का,
अब तो लगने लगा ये राह भी नशीली है।
...गर्मी को पानी से धोएँ, बारिश को हम खूब सुखाएँ
-
उनका मौसम
देवेन्द्र कुमार
गर्मी को पानी से धोएँ
बारिश को हम खूब सुखाएँ
जाड़े को फिर सेंक धूप से
अपनी दादी को खिलवाएँ।
कैसा भी ...
1 सप्ताह पहले


7 टिप्पणियॉं:
कभी न ख़त्म हो ये सिलसिला अदावत का,
अब तो लगने लगा ये राह भी नशीली है।
लाजवाब गज़ल के लिये अदीब जी को बधाई
बहुत प्यारी गजल है। बधाई स्वीकारें।
लाजवाब गज़ल के लिये बधाई
Adeeb ji, Khoobsoorat Ghazal kahi hai aapne.
sundar ...
kash aur majtee ...
"मेरे ख़तों की स्याही तो कब की सूख चुकी,
मेरे फ़सानों की स्याही अभी भी गीली है।"
बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदलीं
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आँसू बहते हैं
तेरे कारिंदे उजले चेहरे लिये फिरते हैं,
उन्हीं के ज़ुल्म से मेरी भी पीठ नीली है।
Zindagi ki talkh sachchaai ko bayaan karta sundar sher.
एक टिप्पणी भेजें