सच को आवाज़ देने वाले का, ये ज़माना रक़ीब होता है।

-डॉ0 सुधाकर अदीब-

मुफ़लिसी1 में जो शाह होता है,
आदमी वो अजीब होता है।

सच को आवाज़ देने वाले का,
ये ज़माना रक़ीब2 होता है।

रहनुमाँ की तलाश कौन करे,
उसकी ख़ातिर सलीब होता है।

चमन से फूल मिलें या ताज काँटों का,
अपना अपना नसीब होता है।

मौत की बात किस तरह कीजे,
जबकि हम सा हबीब होता है।

यूँ सुख़नवर3 अदीब4 होता है,
जिन्दगी के क़रीब होता है।

1-निर्धनता, 2-शत्रु, 3- लेखक, 4- साहित्यकार

7 टिप्‍पणियॉं:

खुला सांड ने कहा…

dil me utarne waali rachnaa hai !!!

अजय कुमार ने कहा…

रहनुमाँ की तलाश कौन करे,
उसकी ख़ातिर सलीब होता है
वाजिब बात कही है

श्यामल सुमन ने कहा…

यूँ सुख़नवर अदीब होता है,
जिन्दगी के क़रीब होता है।

सुन्दर भाव की रचना। बहुत खूब। चलते चलते कुछ जोड़ दूँ -

सुमन देख रहा है दुनिया को
प्रायः अदीब ही गरीब होता है

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

Aasif Dehelvi ने कहा…

Adeeb ji, Zindagi ki sachachaai ko aapne bakhoobi bayaan kiya hai.

Arshia Ali ने कहा…

अपने समय की शानदार गजल।
अदीब जी को बहुत बहुत बधाई।

विनय श्रीवास्तव ने कहा…

जीवन की सच्चाईयों को आपने बहुत आसानी से गजल में पिरो दिया है।

Roli Mishra ने कहा…

Sundar Gazal Hai, Badhai.