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काश ऐसे में तुम चले आते, आज मौसम बड़ा सुहाना था।

-नरेश निसार-

वो ज़माना भी क्या ज़माना था।
जब मिरा उन का दोस्ताना था।

उम्र थी, वक्त था, बहाना था,
तेरी गलियों में आना-जाना था।

सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।

कौन से रास्ते पे आ निकले,
कौन से रास्ते पे जाना था।

काश ऐसे में तुम चले आते,
आज मौसम बड़ा सुहाना था।

शख्श वो था नये ज़माने का,
मेरा अन्दाज़ कुछ पुराना था।

7 टिप्‍पणियॉं:

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।

कौन से रास्ते पे आ निकले,
कौन से रास्ते पे जाना था।

बहुत खूब...

Nirmla Kapila ने कहा…

सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।
उम्र थी, वक्त था, बहाना था,
तेरी गलियों में आना-जाना था।
लाजवाब शुभकामनायें

sada ने कहा…

सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।

बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खूब। लाजवाब रचना

M VERMA ने कहा…

कौन से रास्ते पे आ निकले,
कौन से रास्ते पे जाना था।
अच्छा कश्मकश! सुन्दर गजल

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।

बहुत खूब जाकिर भाई...बेहद खूबसूरत ग़ज़ल कह दी है आपने...बधाई...
नीरज

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत आनन्द आया. नरेश निसार जी की रचना पेश करने का आभार.