-नरेश निसार-
वो ज़माना भी क्या ज़माना था।
जब मिरा उन का दोस्ताना था।
उम्र थी, वक्त था, बहाना था,
तेरी गलियों में आना-जाना था।
सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।
कौन से रास्ते पे आ निकले,
कौन से रास्ते पे जाना था।
काश ऐसे में तुम चले आते,
आज मौसम बड़ा सुहाना था।
शख्श वो था नये ज़माने का,
मेरा अन्दाज़ कुछ पुराना था।
हिन्दी ब्लॉगर्स अवार्ड
"संवाद डॉट कॉम" द्वारा 20 श्रेणियों में दिये जाने वाले 2009 के श्रेष्ठ ब्लॉगर्स सम्मान की घोषणा प्रारम्भ हो चुकी है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)






7 टिप्पणियॉं:
सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।
कौन से रास्ते पे आ निकले,
कौन से रास्ते पे जाना था।
बहुत खूब...
सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।
उम्र थी, वक्त था, बहाना था,
तेरी गलियों में आना-जाना था।
लाजवाब शुभकामनायें
सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।
बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति ।
बहुत खूब। लाजवाब रचना
कौन से रास्ते पे आ निकले,
कौन से रास्ते पे जाना था।
अच्छा कश्मकश! सुन्दर गजल
सिर्फ उम्मीद पर रहीं जिंदा,
मेरी खुशियों का क्या ठिकाना था।
बहुत खूब जाकिर भाई...बेहद खूबसूरत ग़ज़ल कह दी है आपने...बधाई...
नीरज
बहुत आनन्द आया. नरेश निसार जी की रचना पेश करने का आभार.
एक टिप्पणी भेजें