फिर कहीं अहसास अब मरने लगा है क्या करूं?

-रमेश प्रसून-

दिल मेरा जददोजेहद करने लगा है क्या करूं?
फिर कहीं अहसास अब मरने लगा है क्या करूं?

यह नदी जज्बात की सूखे नहीं बस इसलिए,
एक झरना आँख से झरने लगा है क्या करूं?

झील की गहराई में प्रतिबिम्ब हिलता देखकर,
चन्द्रमा भी रात से डरने लगा है क्या करूं?

आग लगनी लाजिमी है, फूस का यह ढ़ेर अब,
कान चिंगारी के कुछ भरने लगा है क्या करूं?

चाहता था बात धरती की करूँ तुझसे मगर,
पाँव तू आकाश पर धरने लगा है क्या करूं?

2 टिप्‍पणियॉं:

वन्दना ने कहा…

यह नदी जज्बात की सूखे नहीं बस इसलिए,
एक झरना आँख से झरने लगा है क्या करूं?

behtreen alfaaz ..........khoobsoorat bhav.

Mithilesh dubey ने कहा…

बेहतरीन लिखा है, शब्दो का चयन लाजवाब रहा।