-वाहिद अली ‘वाहिद’-
वक्त के सिर पे चलता रहा आदमी।
यूं ही गिरता संभलता रहा आदमी।
आंधियों ने बुझाये हज़ारों दिये,
पर अंधेरों में जलता रहा आदमी।
भीड़ में भेड़ सा जब चला हर कदम,
भगदड़ों में कुचलता रहा आदमी।
देह की आग से, नेह के राग पर,
मोम बनके पिघलता रहा आदमी।
असली चेहरा दिखाने से डरता हुआ,
रोज़ चेहरा बदलता रहा आदमी।
देवता बनके जीना गंवारा न था,
स्वर्ग से भी निकलता रहा आदमी।
वक्त की आंधियों से बचाकर कलम,
फूलता और फलता रहा आदमी।
...गर्मी को पानी से धोएँ, बारिश को हम खूब सुखाएँ
-
उनका मौसम
देवेन्द्र कुमार
गर्मी को पानी से धोएँ
बारिश को हम खूब सुखाएँ
जाड़े को फिर सेंक धूप से
अपनी दादी को खिलवाएँ।
कैसा भी ...
1 सप्ताह पहले


9 टिप्पणियॉं:
kya khoob ghazal.............
bahut khoob ghazal........
aadmi k sandarbh me umda rachna
badhaai !
बहुत सुंदर लिखा .. बधाई !!
बहुत सुन्दर, रजनीश जी. आभार.
वक्त की आंधियों से बचाकर कलम,
फूलता और फलता रहा आदमी।
क्या बात कही...सुंदर
regards
देह की आग से, नेह के राग पर,
मोम बनके पिघलता रहा आदमी।
bahut hi sundar baat kahi hai aapane jisame aadami hi sirf hota hai .....apani bhawanao ko liye huye.....bahut sundar
भीड़ में भेड़ सा जब चला हर कदम,
भगदड़ों में कुचलता रहा आदमी।
लाजवाब...ग़ज़ल का हर शेर लाजवाब है...बहुत बहुत बधाई.
नीरज
देह की आग से, नेह के राग पर,
मोम बनके पिघलता रहा आदमी।
असली चेहरा दिखाने से डरता हुआ,
रोज़ चेहरा बदलता रहा आदमी।
vaah!
देह की आग से, नेह के राग पर,
मोम बनके पिघलता रहा आदमी।
-जबरदस्त...वाह!!
असली चेहरा दिखाने से डरता हुआ,
रोज़ चेहरा बदलता रहा आदमी।
सही कहा है आदमी का असली चेहरा ही तो नही दिखता है.
हर शेर खूबसूरत
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