देह की आग से, नेह के राग पर, मोम बनके पिघलता रहा आदमी

-वाहिद अली ‘वाहिद’-

वक्त के सिर पे चलता रहा आदमी।
यूं ही गिरता संभलता रहा आदमी।

आंधियों ने बुझाये हज़ारों दिये,
पर अंधेरों में जलता रहा आदमी।

भीड़ में भेड़ सा जब चला हर कदम,
भगदड़ों में कुचलता रहा आदमी।

देह की आग से, नेह के राग पर,
मोम बनके पिघलता रहा आदमी।

असली चेहरा दिखाने से डरता हुआ,
रोज़ चेहरा बदलता रहा आदमी।

देवता बनके जीना गंवारा न था,
स्वर्ग से भी निकलता रहा आदमी।

वक्त की आंधियों से बचाकर कलम,
फूलता और फलता रहा आदमी।

9 टिप्‍पणियॉं:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

kya khoob ghazal.............
bahut khoob ghazal........

aadmi k sandarbh me umda rachna

badhaai !

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा .. बधाई !!

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

बहुत सुन्‍दर, रजनीश जी. आभार.

seema gupta ने कहा…

वक्त की आंधियों से बचाकर कलम,
फूलता और फलता रहा आदमी।

क्या बात कही...सुंदर

regards

ओम आर्य ने कहा…

देह की आग से, नेह के राग पर,
मोम बनके पिघलता रहा आदमी।

bahut hi sundar baat kahi hai aapane jisame aadami hi sirf hota hai .....apani bhawanao ko liye huye.....bahut sundar

नीरज गोस्वामी ने कहा…

भीड़ में भेड़ सा जब चला हर कदम,
भगदड़ों में कुचलता रहा आदमी।
लाजवाब...ग़ज़ल का हर शेर लाजवाब है...बहुत बहुत बधाई.
नीरज

Parul ने कहा…

देह की आग से, नेह के राग पर,
मोम बनके पिघलता रहा आदमी।

असली चेहरा दिखाने से डरता हुआ,
रोज़ चेहरा बदलता रहा आदमी।
vaah!

Udan Tashtari ने कहा…

देह की आग से, नेह के राग पर,
मोम बनके पिघलता रहा आदमी।


-जबरदस्त...वाह!!

M VERMA ने कहा…

असली चेहरा दिखाने से डरता हुआ,
रोज़ चेहरा बदलता रहा आदमी।
सही कहा है आदमी का असली चेहरा ही तो नही दिखता है.
हर शेर खूबसूरत