माँग रहा दो रोटियाँ, भूखा हिन्दुस्तान

–राजेन्द्र वर्मा–

जिसे खोजता मैं रहा, यहाँ–वहाँ दिन–रात।
जीवन भर चलता रहा, वही हमारे साथ।।

अपनों से तो जीत भी, लगती जैसे हार।
जीत लिया ख़ुद को अगर, जीत लिया संसार।।

पगले मन, तू ही बता, कहाँ चलूं, किस ठाँव।
गज–भर की चादर दिये, मीटर–भर के पाँव।।

चिडिया चहकी बाग में, आया फिर से बौर।
मगर बाग ही बिक गया, चिडिया ढूंढे ठौर।।

जल संकट है देश का जलता हुआ सवाल।
मिनरल वाटर बेचकर बनिया माला–माल।।

कर की चोरी कर हुए, पूँजीपति भगवान।
माँग रहा दो रोटियाँ, भूखा हिन्दुस्तान।।

दिन–भर कूड़ा बीनकर, जो है थककर चूर।
क्या वह बच्चा देश की, आँखों का है नूर।।

3 टिप्‍पणियॉं:

sada ने कहा…

जल संकट है देश का जलता हुआ सवाल।
मिनरल वाटर बेचकर बनिया माला–माल।।

बहुत ही बेहतरीन ।

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi achchhi baate karate ho dil ko chhoo leti hai aapki har ek rachna
....ek sundar bhawa liye huye kawita...atisundar

लाल और बवाल (जुगलबन्दी) ने कहा…

शानदार कहा भाई आपने। भूखा हिन्दुस्तान।