हिन्दी ब्लॉगर्स अवार्ड

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जब से तुम प्राणों में पुलके, पीड़ा से पहचान हो गई

-डा० लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’-

जब से तुमने दिशा मोड़ दी, राह बहुत आसान हो गई।

जुही फूल सा प्यार तुम्हारा, मन्द-मन्द महका जीवन में।
ऊषा सदृश तुम्हारी चितवन, जगा गई नव ज्योति नयन में।

जब से तुम प्राणों में पुलके, पीड़ा से पहचान हो गई।
जब से तुमने दिशा मोड़ दी, राह बहुत आसान हो गई।

विहंस उठे रजनीगंधा ज्यों, अपने वासन्ती यौवन में।
जैसे प्रात: किरण जगाये, सोया प्यार मधुप के मन में।

वैसे तुम गीतों में विलसे, मेरी प्रीति जवान हो गई।
जब से तुमने दिशा मोड़ दी, राह बहुत आसान हो गई।

शीश-महल सा जग लगता है, हर दर्पण में रूप तुम्हारा।
जेठ दुपहरी में छाया सा, प्यार बन गया एक सहारा।

जब से तुम कण-कण में बिखरे, मेरी दृष्टि महान हो गई।
जब से तुमने दिशा मोड़ दी, राह बहुत आसान हो गई।

5 टिप्‍पणियॉं:

RAJIV MAHESHWARI ने कहा…

हार्दिक शुभ कामनाएं !
अच्छा है अंदाज़े-बयाँ।
सुस्वागतम्।

seema gupta ने कहा…

शीश-महल सा जग लगता है, हर दर्पण में रूप तुम्हारा।
जेठ दुपहरी में छाया सा, प्यार बन गया एक सहारा।
यह पक्तियां बहुत खुब लगी, बहुत सुंदर भावाभि‍व्‍यक्‍ति‍।

regards

ओम आर्य ने कहा…

आपका यह अन्दाज भी काबिले तारिफ है .......बहुत बहुत सुन्दर ..........लाज़बाव...........अतिसुन्दर .......बेमिशाल.........बधाई

Udan Tashtari ने कहा…

डा० लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ की यह बेहतरीन रचना पढ़वाने का आभार. आनन्द आ गया.

मीत ने कहा…

बहुत सुन्दर. शुक्रिया इस बेहतरीन रचना के लिए.