-रमेश चन्द्र पाल
बचपन से आज तक
आलोचनायें ही सुनता आया हूं।
निरीह प्राणी ठहरा
इसलिये चुप रह जाता हूं।
स्कूल में अध्यापक
बुद्धिहीन कह कर बुलाते थे।
गल्तियाँ कोई और करता था
सज़ा हम ही पाते थे।
जब मैं बड़ा हुआ
अपने पैरों पर खड़ा हुआ
शादी हुई तो लोगों ने
दूल्हा मरियल कहा।
किसी ने भूखा
तो किसी ने अडियल कहा।
आफिस में बॉस
निखट्टू करके बुलाते हैं।
गल्तियाँ कोई करता है
स्पष्टीकरण हम ही पाते हैं।
वैसे तो आजकल ज़माना ही
मक्खनबाजी का है
सभी लगाते हैं
पर मक्खनबाज हम ही कहलाते हैं।
अब तो पत्नी कसम
जब भी कोई प्यार से बुलाता है,
मन कहता है बुद्धू बनाएगा
इसलिये बहुत गुस्सा आता है।
...गर्मी को पानी से धोएँ, बारिश को हम खूब सुखाएँ
-
उनका मौसम
देवेन्द्र कुमार
गर्मी को पानी से धोएँ
बारिश को हम खूब सुखाएँ
जाड़े को फिर सेंक धूप से
अपनी दादी को खिलवाएँ।
कैसा भी ...
1 सप्ताह पहले


5 टिप्पणियॉं:
पत्नी कसम!! पत्नी ने पढ़ लिया तो जान बचने के लाले पड़ जाएंगे!
ek manovedana bhi hai ki ek insaan jo ki aap hi hai ........hamesha se sabki galatiyo ki saja aap hi pate aaye ho ..........yah bahut hi painful hai.........par asar yah hai ki pyar se wiswash utha gaya hai aapka..............sachchhi abhiwyakti
अभिषेक को सुन तुरंत बंद कर दिया ब्लॉग. :)
बहुत रोचक रचना...आपने जो बतायीं ऐसी बातें अधिकांश लोगों के साथ होती हैं...आप अकेले नहीं हैं...:))
नीरज
:) :)
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