काँटों ने खुद ही गुल को संवारा कभी–कभी

-सरवर लखनवी-

काँटों ने खुद ही गुल को संवारा कभी–कभी।
ग़ैरों ने भी दिया है सहारा कभी–कभी।

मन्जिल की जुस्तजू में भटकना बहुत पड़ा,
ख़ामोश रहके तुझको पुकारा कभी – कभी।

दुनिया की बेरूख़ी में जो देखी कभी कमी,
आया है लब पे नाम तुम्हारा कभी – कभी।

ग़ैरों की बेवफाई का शिकवा करूँ तो क्या,
अपने भी दे सके न सहारा कभी – कभी।

‘सरवर’ की बेकसी को ज़माने से पूछिये,
जिसको बहार ने भी है मारा कभी – कभी।

6 टिप्‍पणियॉं:

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

सरवर जी की इस गजल की प्रस्तुति के लिये धन्यवाद ।

श्यामल सुमन ने कहा…

मन्जिल की जुस्तजू में भटकना बहुत पड़ा,
ख़ामोश रहके तुझको पुकारा कभी – कभी।

खूबसूरत अभिव्यक्ति। पूरी गजल अच्छी है। खामोश रह कर पुकारना - वाह। किसी की पंक्तियाँ हैं-

ऐसी वैसी बातों से तो अच्छा है खामोश रहो।
या फिर ऐसी बात करो जो खामोशी से अच्छी हो।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

अल्पना वर्मा ने कहा…

achchee lagi ghazal.

sabhi sher kamal ke hain.

रंजन ने कहा…

बहुत अच्छी..

ग़ैरों की बेवफाई का शिकवा करूँ तो क्या,
अपने भी दे सके न सहारा कभी – कभी।

क्या कहने..

विनीता यशस्वी ने कहा…

ग़ैरों की बेवफाई का शिकवा करूँ तो क्या,
अपने भी दे सके न सहारा कभी – कभी।

bahut khub... apka ye blog to maine aaj hi dekha...

nidhitrivedi28 ने कहा…

ख़ामोश रहके तुझको पुकारा कभी – कभी।
हर एक शब्द बहुत खास और बहुत मायने रखता है! बहुत सुंदर कविता!