-सरवर लखनवी-
काँटों ने खुद ही गुल को संवारा कभी–कभी।
ग़ैरों ने भी दिया है सहारा कभी–कभी।
मन्जिल की जुस्तजू में भटकना बहुत पड़ा,
ख़ामोश रहके तुझको पुकारा कभी – कभी।
दुनिया की बेरूख़ी में जो देखी कभी कमी,
आया है लब पे नाम तुम्हारा कभी – कभी।
ग़ैरों की बेवफाई का शिकवा करूँ तो क्या,
अपने भी दे सके न सहारा कभी – कभी।
‘सरवर’ की बेकसी को ज़माने से पूछिये,
जिसको बहार ने भी है मारा कभी – कभी।
..वयस्क श्रोताओं के बीच बाल कहानियों का पाठ।
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‘साझी दुनिया’ लखनऊ की एक चर्चित संस्था है, जो ‘झूठा सच’ जैसे युगान्तरकारी उपन्यास लिखने वाले रचनाकार यशपाल जी के महानगर स्थित मकान (बी-335) में स्थित है। ...
2 दिन पहले


6 टिप्पणियॉं:
सरवर जी की इस गजल की प्रस्तुति के लिये धन्यवाद ।
मन्जिल की जुस्तजू में भटकना बहुत पड़ा,
ख़ामोश रहके तुझको पुकारा कभी – कभी।
खूबसूरत अभिव्यक्ति। पूरी गजल अच्छी है। खामोश रह कर पुकारना - वाह। किसी की पंक्तियाँ हैं-
ऐसी वैसी बातों से तो अच्छा है खामोश रहो।
या फिर ऐसी बात करो जो खामोशी से अच्छी हो।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
achchee lagi ghazal.
sabhi sher kamal ke hain.
बहुत अच्छी..
ग़ैरों की बेवफाई का शिकवा करूँ तो क्या,
अपने भी दे सके न सहारा कभी – कभी।
क्या कहने..
ग़ैरों की बेवफाई का शिकवा करूँ तो क्या,
अपने भी दे सके न सहारा कभी – कभी।
bahut khub... apka ye blog to maine aaj hi dekha...
ख़ामोश रहके तुझको पुकारा कभी – कभी।
हर एक शब्द बहुत खास और बहुत मायने रखता है! बहुत सुंदर कविता!
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