फिर कोई आरज़ू सी प्यासी है

-राजीव राय-

आज फिर शाम से उदासी है।
फिर कोई आरजू सी प्यासी है।

कैसे इज़हार हो मोहब्बत का,
बात कहने को ये ज़रा सी है।

मेरी आँखों को मिल गये आँसू,
रूह तो अब भी मेरी प्यासी है।

साकिया अब तो उठा दे ये नक़ाब,
मैक़दे में बहुत उदासी है।

सैकड़ों ग़म मेरी तलाश में हैं,
और ये जान इक ज़रा सी है।

4 टिप्‍पणियॉं:

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

सैकड़ों ग़म मेरी तलाश में हैं,
और ये जान इक ज़रा सी है।"

वाह ! मुग्ध हुआ ।

शरद कोकास ने कहा…

राजीव जी कुछ नये बिम्बों को लेकर गज़ल कहें तो मज़ा आये..

venus kesari ने कहा…

कैसे इज़हार हो मोहब्बत का,
बात कहने को ये ज़रा सी है।
सभी शेर पसंद आये
खूबसूरत गजल

वीनस केसरी

Kunwar Kusumesh ने कहा…

Aakhiri sher men sudhar ki zaroorat hai. kuchh yun hona chahiye:-

saekadon gam humen rahe ghere,
bat kahne ko ye zara - si hai.

Kunwar Kusumesh
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Lucknow-226022
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