अब रस्ता ही घर लगता है

-मनीष-

महव-ए-यास1 क़मर2 लगता है।
होगी नहीं सहर लगता है।

क्यूं परवाज़3 हुई है मुश्किल,
टूट गए हैं पर लगता है।

उम्र गई है चलते-चलते,
अब रस्ता ही घर लगता है।

जिस्म नहीं ये ज़हन4 है ज़्ख्मी,
फूल भी अब पत्थर लगता है।

तुम अख़लाक5 को मिट्टी समझो,
हमको तो ज़ेवर लगता है।

आदी हूं मैं इक रहबर6 का,
तन्हा चलते डर लगता है।

जाने कैसे बिछड़ गए हम,
लग गई यार नज़र लगता है।

1– दु:ख में डूबा 2– चाँद 3– उड़ान 4– विचार (विचारधारा)
5–सद व्यवहार 6– मार्ग दर्षक


3 टिप्‍पणियॉं:

रंजना ने कहा…

Waah Waah Waah !!!!

Bahut hi khoobsoorat gazal....har sher kabile daad....

कीर्ति वैद्य ने कहा…

बहुत खूब लिखा है आपने। बधाई।

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

बहुत प्यारी गजल।
खासकर यह शेर "उम्र गयी है चलते चलते, अब रस्ता ही घर लगता है" तो लाजवाब करता है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }