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दिल के दिल ही में सारे भरम रह गए

- अनुप लखनवी -

अपनी सूरत पे थोड़े जो ख़म रह गए।
इसलिए इश्क में पीछे हम रह गए।

सबको क्या-क्या दिया तूने उम्रे रवाँ,
तुझसे लेकर हमीं बार-ए-ग़म रह गए।

पहले होती थी फूलों की बारिश जहाँ,
अब वहाँ ख़ार हैं, फूल कम रह गए।

छोड़कर चल दिए बिन कहे बिन सुने,
दिल के दिल ही में सारे भरम रह गए।

दूर हमसे हो तुम और तुमसे हैं हम,
कैसे हालात में फंस के हम रह गए।

सबको दौलत की चाहत है जैसे मिले,
मूल्य जीवन के अब कम से कम रह गए।

तीरगी, तिश्नगी, बेरूख़ी और ग़म,
इस सभी के निशाने पे हम रह गए।

बेग़रज़ दूसरों की मदद जो करें,
अब वो इन्सां कहां मोहतरम रह गए।

6 टिप्‍पणियॉं:

maandarpan ने कहा…

कोशिश करते करते एक अच्छी ग़ज़ल दी अपने पर आप काफिये हो सके तो मत दोहराया मत करें

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुंदर रचना के लिए बधाई!

विनय ने कहा…

बढ़िया है!

PN Subramanian ने कहा…

अच्छी लगी आपकी यह रचना.

venus kesari ने कहा…

रजनीश जी
क्या आपने विज्ञान कथा नाम की पुस्तक लिखी है ???
अगर हाँ तो मैं उसे पढ़ चूका हूँ और मुझे पुस्तक बहुत अच्छी लगी

वीनस केसरी

प्रकाश ने कहा…

"दिलके अरमा आसुंओं मे बह गये"
की याद दिला दी.