-राजीव राय-
उसी ने ज़ख़्म दिये जो भी मेरा ख़ास हुआ।
पर बहुत देर से इस बात का एहसास हुआ।
जहाँ ने दी कहाँ फुर्सत जो सोचते हम भी,
किसे मिली है ख़ुशी, कौन कब उदास हुआ।
बेवजह हमने ज़माने को बेवफ़ा समझा,
तंगहाली में भला, कौन किसके पास हुआ।
रूह के साथ, इक लाश लिये फिरता था,
दम निकलने लगा तो रूह को एहसास हुआ।
ग़म मेरा दोस्त है लेकिन ये राज़ रखता हूँ,
कब हुआ दूर मेरे कब वो मेरे पास हुआ।


7 टिप्पणियॉं:
जहाँ ने दी कहाँ फुर्सत जो सोचते हम भी,
किसे मिली है ख़ुशी, कौन कब उदास हुआ।
जाकिर भाई...क्या खूब ग़ज़ल कही है आपने...ज़िन्दगी को दर्द को शिद्दत से बयां किया है...हर शेर के लिए दाद कबूल फरमाएं और ऐसे ही लिखते रहें...
नीरज
जहाँ ने दी कहाँ फुर्सत जो सोचते हम भी,
किसे मिली है ख़ुशी, कौन कब उदास हुआ।
रूह के साथ, इक लाश लिये फिरता था,
दम निकलने लगा तो रूह को एहसास हुआ।
khoobsurat purmanii sher
gahre bhaav hai aapke
bandhaiii
Waah !! Waah !! Waah !!
har sher khoobsoorat kabile daad...
bahut hi sundar gazal....
aanand aa gaya padhkar waah !!
राजीव साहब को मिल के बधाई देवेंगे
बेवजह हमने ज़माने को बेवफ़ा समझा,
तंगहाली में भला, कौन किसके पास हुआ।
sach kaha aapne ..
उसी ने ज़ख़्म दिये जो भी मेरा ख़ास हुआ।
पर बहुत देर से इस बात का एहसास हुआ।
बहुत सच कहा आपने . बधाई
उसी ने ज़ख़्म दिये जो भी मेरा ख़ास हुआ।
पर बहुत देर से इस बात का एहसास हुआ।
waah..bahut khuub
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