तपिश

आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !

दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !

सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

2 टिप्‍पणियॉं:

Babli ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आपको मेरा खाना मसाला ब्लॉग पसंद आया! लगता है आप भी मेरे जैसे खाने के शौकीन है! आप को भी खाना बनाना आता होगा तो हमें भी नया पकवान बनाना सिखायेगा ज़रूर!
आपकी कविता बहुत अच्छी लगी! बहुत सुंदर लिखा है आपने!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

आप का ब्लाग अच्छा लगा।धन्यवाद..
आप मेरे ब्लाग्स पर आयें,आप को यकीनन अच्छा लगेगा।