आप फिरभी मौन हैं?

जागिये, अब तो बहुत ही सो लिए।

छोडिये तन्द्रा कि उठिए, डोलिए।


दे रही दस्तक किरण है द्वार पर,

रौशनी कहती कि खिडकी खोलिए।


हादसे पर हो रहे हैं हादसे,

आप फिरभी मौन हैं कुछ बोलिए।


कैद महलों में हुई है चांदनी,

शक्ति अपने बाजुओं की तोलिए।


पालिए मत साँप अपनी जीभ में,

इन्द्रघनुषी रंग धरा पर घेलिए।


देश की तस्वीर ही होगी नयी,

साथ सब के सब अगर हैं हो लिए।


-डा0 गणेशदत्त सारस्वत

2 टिप्‍पणियॉं:

Babli ने कहा…

बहुत ही उन्दा लिखा है आपने!

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

एक अच्छी गजल।

----------
S.B.A. TSALIIM.