सोने का बिरवा उगा चाँदी के अंगना।
मह-मह-मह मह कउठा केसरिया सपना।
किरनपरी सूरज की रोशनी बिखेरे,
लोहे के हाथों में खनक रहा कंगना।
सौरभ अंकोरे फूल केसर की क्यारी,
आंधियों में देखो कहीं झुलस नहीं जाय।
चंदन को घूर रहे कितने संपोलिए।
सविता पर शर ताने कितने कहेलिए।
चाहता सवेरे को लीलना अंधेरा,
कलियों को ताक रहे शूलों के भेडिए।
नखतों की झिलमिल पर ललचाए बौने
सावधान देखो कहीं दाग लग न जाय।
कुमकुम की धूल उडी नभ की डगरिया।
किरनों की डोरी से उतरी उजेरिया।
मौसमी बहारों के संग-संग खेली,
सपनों की धरती पर कंचनी नगरिया।
पूनम के द्वार जुडा चांदनी का मेला,
चंदा को देखो कही नाग डस न जाय।
बादलों को झांक रहे पौरूषी सिपहिये।
बार-बार टेर रहे कुंवर कन्हैये।
एक बूंद स्याही की मजार का छेडे,
धूमकेतुओं से भरे ताल औ तलैये।
अमृत को घेरे आज विष के वृकोदर
प्रहरी सजग, कहीं आंख लग न जाय।
-डा0 गणेशदत्त सारस्वत


2 टिप्पणियॉं:
वाह वाह क्या बात है!!
एक शानदार गीत।
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S.B.A. TSALIIM.
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