-हास्य कविता
आज बड़ी हिम्मत करके कह पाया हूँ सच्चाई।
मेरे जीवन भर में आई, केवल एक बुराई।
जब से पैदा हुआ तभी से बिलकुल नेक रहा हूँ।
नियमपूर्वक मयखाने में मत्था टेक रहा हूँ।
दर्द न हो इसलिए रख लिया अपने पास दवाई।
थोड़ा-बहुत पढ़ा लेकिन मैं कढ़ा ज़रा कुछ ज्यादा।
नेतागीरी करने का फिर अपना बना इरादा।
चोर-लफंगों, नंगों की अब करता हूँ अगुवाई।
ऊधव का लेना, माधव का देना कहाँ गलत है।
उनकी कैसे निभे जिन्हें कर्जा लेने की लत है।
जिससे कुछ ले लिया वस्तु वह कभी नहीं लौटाई।
रिश्वत का दस्तूर पुराना है, यह नया नहीं है।
यह अधिकार समझिये इसमें कोई दया नहीं है।
लाभ मिले चाहे जिसको, मैं ले लेता चौथाई।
-भोलानाथ ‘अधीर’
A Hindi (Comedy) poem (Haasya Kavitaa) By Bholanath ‘Adheer’
हिन्दी ब्लॉगर्स अवार्ड
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