बिताना मुहाल है..

–मनीष

दामन ग़म–ए–जहाँ से छुड़ाना मुहाल है।
दो दिन की जिन्दगी को बिताना मुहाल है।

चलते हैं साथ वक़्त–ए–गुरेज़ा1 के मरहले2,
इस जिन्दगी का बोझ उठाना मुहाल है।

पहले भी कई बार मुख़ालिफ़3 रही हवा,
अब तो मगर चराग़ जलाना मुहाल है।

उस बज़्म–ए–बावक़ार4 के किस्से न पूछिए,
इस दरजा तीरगी5 थी, बताना मुहाल है।

वो दिन कि मुन्तिज़र6 थे मिरे सैकड़ों हदफ7,
अब वक़्त ये कि एक निशाना मुहाल है।

छाई है हादसात की आंधी हयात8 पर,
अब ख़्वाब के परिन्द उड़ाना मुहाल है।

वो नाख़ुदा9, वो कश्ती, वो तैराक क्या हुए,
इक डूबते नफ़स10 को बचाना मुहाल है।

ऐसी हवा चली कि मिरे ज़ख़्म छिल गए,
और टीस वो उठी कि बताना मुहाल है।

1– भूतकाल 2– समस्याएं 3– विरूद्ध 4–गौरवशाली सभा 5– अंधेरा
6– प्रतीक्षारत 7– लक्ष्य 8– जीवन 9– नाविक 10– प्राणी

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