–सुरेश उजाला
भीड़–
खुश रहती है
उत्सव–पर्व
आयोजनों में
भीड़–
खामोश हो जाती है
गम–दु:ख
दर्द में
भीड़–
उग्र हो उठती है
समस्या–आंदोलन
जनहित
और उसके समाधान में
लेकिन–
भीड़
जब भाड़ बनती है–
तो ईंधन के पास
कोई तर्क नहीं होता
सिवा जलने के।
A Hindi Poem (Nayi Kavita) by Suresh Ujala
...गर्मी को पानी से धोएँ, बारिश को हम खूब सुखाएँ
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उनका मौसम
देवेन्द्र कुमार
गर्मी को पानी से धोएँ
बारिश को हम खूब सुखाएँ
जाड़े को फिर सेंक धूप से
अपनी दादी को खिलवाएँ।
कैसा भी ...
1 सप्ताह पहले


1 टिप्पणियॉं:
...please where can I buy a unicorn?
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