डॉ0 सुरेश उजाला के हाइकु


हुई खिन्‍नता
व्‍यक्ति-व्‍यक्ति में देख
भेद-भिन्‍नता।

भू पे आकर
पढ़े कबीर सिर्फ
ढ़ाई आखर।

पाते ही मौका
इंसान ने त्‍वरित
दिया है धोखा।

रहा है बेल
चकले पे आदमी
दिमागी रोटी।

वृक्ष हो गई
जो पीढि़यां गल के
कुछ बो गई।

बदला वक्‍त
सब से सस्‍ता हुआ
इंसानी रक्‍त।

गाढ़ी कमाई
देश के कमेरों की
गुण्‍डों ने खाई।
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वंदना का अर्थ चाँटे ?

वंदना का अर्थ चाँटे
-अवश्‍नी कुमार पाठक

दिन नहीं कट रहे काटे,
कौन है जो दर्द बाँटे ?

शीश पर बन कर शिलाएँ, टूट पड़ती आपदाएँ।
थपकियाँ देती रहीं जो, हो गई बागी हवाएँ।
बन गए हैं फूल काँटे।

फेर लेते लोग आँखें, हृदय में चुभती शलाखें।
नीम सी कड़वी हुई हैं, जिंदगी की मधुर दाखें।
जहाँ देखो वहाँ घाटे।

मचा हाहाकर कैसा, वणिक-सा व्‍यवहार कैसा?
प्रेम के अंदर घृणा है, अमृत विश के स्‍वाद जैसा।
अर्चना का अर्थ चाँटे।

हो रहे रिश्‍ते अबोले, कौन खिड़की द्वार खोले?
दूरियाँ इतनी बढ़ीं, पर बन रहे हम आज भोले।
खाइयाँ ये कौन पाटे?
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मक्‍कारी के बदले क्‍या मिलती है कभी दया?

मक्‍कारी के बदले क्‍या मिलती है कभी दया?
-शिव भजन ‘कमलेश’

पछताने की नहीं जरूरत, जो कुछ निकल गया।
दिल-दिमाग से अब जुटना है ले उत्‍साह नया।

अपनी-अपनी करें समीक्षा, क्‍या गलती की है
काम किया है मन से या केवल मस्‍ती की है
मक्‍कारी के बदले क्‍या मिलती है कभी दया।

करना होंगा हंसकर जो भी समुचित कार्य मिले।
ऐसा कभी न अवसर देना मालिक करे गिले।
सदा निभानी होगी जिम्‍मेदारी पूर्णतया।

दोनों हाथ जनम के साथी, इनमें शक्ति भरें
सतत सृजन की ओर बढ़ें, इतनी अनुरक्ति भरें
मत रहिएगा कभी दूसरों पर निर्भर कृपया।

सच्‍चाई से मेहनत और लगन से हो नाता
समय एक दिन बन जाएगा, सुंदर फल दाता
यह भी संभव इन हाथों का मैल बने रूपया।
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...ईमानदारी भीख मांगती नजर आती है


-अनुराग चंदेरी 

परियों की  कथायें हों
या हों सपने 
दोनों ही 
असंभव होते हुए भी 
संभव नजर आते हैं
लेकिन जिंदगी तो बुनी है 
गणित के ताने-बाने से 
यहाँ बेईमानी भी तर्क से 
चलती है 
तभी तो मानदारी भीख मांगती 
नजर आती है 
और मक्कारी की भाषा में
इतनी मृदुलता है
मानों छल से  
इसका नाता 
गहरा रहा हो 
सदा से 
लेकिन जीवन एक 
दर्शन भी है 
यहाँ मानदारी हार कर भी 
जीत जाती है 
और बेईमानी जीत कर भी 
हार जाती है


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ख़राब हो गए दो घंटे और तीस मिनट, बहस ने रख दिया मुद्दे को और उलझाकर।


 

-ज़हीर कुरैशी

 

मैं चाहता हूँ वो मिल जाए स्‍वप्‍न में आकर,

ये बात उसको बतानी है स्‍वप्‍न में जाकर।


कभी तो पूछे हैं ऐसे सवाल बच्‍चे ने,
हमारी बुद्धि भी चुप हो गयी है चकराकर।

यह दृश्‍य आज भी मुझको अजीब लगता है,
वो आँसुओं को बहाती है फिल्‍म में गाकर।

है सुविधा शुल्‍क की उनकी अलग ही परिभाषा,
डकार लेते नहीं वे भी रिश्‍वतें खाकर।

अकेले फैसला लेने से बात बिगड़ेगी,
हम अपनी राय बताएँगे उनसे चर्चा कर।

वो भाव शून्‍य है संवेदना को क्‍या जाने,
तू सिर को फोड़ रहा है शिला से टकराकर।
 
ख़राब हो गए दो घंटे और तीस मिनट, 
बहस ने रख दिया मुद्दे को और उलझाकर।
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