हुई खिन्नता
व्यक्ति-व्यक्ति में देख
भेद-भिन्नता।
भू पे आकर
पढ़े कबीर सिर्फ
ढ़ाई आखर।
पाते ही मौका
इंसान ने त्वरित
दिया है धोखा।
रहा है बेल
चकले पे आदमी
दिमागी रोटी।
वृक्ष हो गई
जो पीढि़यां गल के
कुछ बो गई।
बदला वक्त
सब से सस्ता हुआ
इंसानी रक्त।
गाढ़ी कमाई
देश के कमेरों की
गुण्डों ने खाई।
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