माँग रहा दो रोटियाँ, भूखा हिन्दुस्तान

–राजेन्द्र वर्मा–

जिसे खोजता मैं रहा, यहाँ–वहाँ दिन–रात।
जीवन भर चलता रहा, वही हमारे साथ।।

अपनों से तो जीत भी, लगती जैसे हार।
जीत लिया ख़ुद को अगर, जीत लिया संसार।।

पगले मन, तू ही बता, कहाँ चलूं, किस ठाँव।
गज–भर की चादर दिये, मीटर–भर के पाँव।।

चिडिया चहकी बाग में, आया फिर से बौर।
मगर बाग ही बिक गया, चिडिया ढूंढे ठौर।।

जल संकट है देश का जलता हुआ सवाल।
मिनरल वाटर बेचकर बनिया माला–माल।।

कर की चोरी कर हुए, पूँजीपति भगवान।
माँग रहा दो रोटियाँ, भूखा हिन्दुस्तान।।

दिन–भर कूड़ा बीनकर, जो है थककर चूर।
क्या वह बच्चा देश की, आँखों का है नूर।।

जब से तुम प्राणों में पुलके, पीड़ा से पहचान हो गई

-डा० लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’-

जब से तुमने दिशा मोड़ दी, राह बहुत आसान हो गई।

जुही फूल सा प्यार तुम्हारा, मन्द-मन्द महका जीवन में।
ऊषा सदृश तुम्हारी चितवन, जगा गई नव ज्योति नयन में।

जब से तुम प्राणों में पुलके, पीड़ा से पहचान हो गई।
जब से तुमने दिशा मोड़ दी, राह बहुत आसान हो गई।

विहंस उठे रजनीगंधा ज्यों, अपने वासन्ती यौवन में।
जैसे प्रात: किरण जगाये, सोया प्यार मधुप के मन में।

वैसे तुम गीतों में विलसे, मेरी प्रीति जवान हो गई।
जब से तुमने दिशा मोड़ दी, राह बहुत आसान हो गई।

शीश-महल सा जग लगता है, हर दर्पण में रूप तुम्हारा।
जेठ दुपहरी में छाया सा, प्यार बन गया एक सहारा।

जब से तुम कण-कण में बिखरे, मेरी दृष्टि महान हो गई।
जब से तुमने दिशा मोड़ दी, राह बहुत आसान हो गई।

गल्तियाँ कोई और करता था सज़ा हम ही पाते थे

-रमेश चन्द्र पाल

बचपन से आज तक
आलोचनायें ही सुनता आया हूं।
निरीह प्राणी ठहरा
इसलिये चुप रह जाता हूं।
स्कूल में अध्यापक
बुद्धिहीन कह कर बुलाते थे।
गल्तियाँ कोई और करता था
सज़ा हम ही पाते थे।
जब मैं बड़ा हुआ
अपने पैरों पर खड़ा हुआ
शादी हुई तो लोगों ने
दूल्हा मरियल कहा।
किसी ने भूखा
तो किसी ने अडियल कहा।
आफिस में बॉस
निखट्टू करके बुलाते हैं।
गल्तियाँ कोई करता है
स्पष्टीकरण हम ही पाते हैं।
वैसे तो आजकल ज़माना ही
मक्खनबाजी का है
सभी लगाते हैं
पर मक्खनबाज हम ही कहलाते हैं।
अब तो पत्नी कसम
जब भी कोई प्यार से बुलाता है,
मन कहता है बुद्धू बनाएगा
इसलिये बहुत गुस्सा आता है।

झरनों का संगीत, हवा का गीत, पलों का साज़ सुनो

-डा0 हरिराज सिंह ‘नूर’-

झरनों का संगीत, हवा का गीत, पलों का साज़ सुनो।
मेरी ग़ज़ल के पैराए में तुम रब की आवाज़ सुनो।।

हर लम्हा पैग़ामे-मुहब्बत दुनिया को देती आई,
सुनना है तो अपने दिल से शाइर की आवाज़ सुनो।

ख़ुशियों के रंगीन नज़ारे, दुनिया भर के लोगों को,
सुबह फ़लक से बोल रही है, उसके मुँह से राज़ सुनो।

ज़हरीला माहौल फ़ना हो धीरे - धीरे बस्ती से,
हम सबको मिलकर कुछ ऐसा करना है आगाज़ सुनो।

मैंने भी तब्दील किया है, अब जीने का ढ़ंग ज़रा,
मुझको देख के कुछ-कुछ बदला उसने भी अंदाज़ सुनो।

तुम चाहे जितने भी पहरे ‘नूर’ बिछा लो गुलशन में,
रोक नहीं पाओ हमको करने से परवाज़ सुनो।

काँटों ने खुद ही गुल को संवारा कभी–कभी

-सरवर लखनवी-

काँटों ने खुद ही गुल को संवारा कभी–कभी।
ग़ैरों ने भी दिया है सहारा कभी–कभी।

मन्जिल की जुस्तजू में भटकना बहुत पड़ा,
ख़ामोश रहके तुझको पुकारा कभी – कभी।

दुनिया की बेरूख़ी में जो देखी कभी कमी,
आया है लब पे नाम तुम्हारा कभी – कभी।

ग़ैरों की बेवफाई का शिकवा करूँ तो क्या,
अपने भी दे सके न सहारा कभी – कभी।

‘सरवर’ की बेकसी को ज़माने से पूछिये,
जिसको बहार ने भी है मारा कभी – कभी।

फिर कोई आरज़ू सी प्यासी है

-राजीव राय-

आज फिर शाम से उदासी है।
फिर कोई आरजू सी प्यासी है।

कैसे इज़हार हो मोहब्बत का,
बात कहने को ये ज़रा सी है।

मेरी आँखों को मिल गये आँसू,
रूह तो अब भी मेरी प्यासी है।

साकिया अब तो उठा दे ये नक़ाब,
मैक़दे में बहुत उदासी है।

सैकड़ों ग़म मेरी तलाश में हैं,
और ये जान इक ज़रा सी है।

अब रस्ता ही घर लगता है

-मनीष-

महव-ए-यास1 क़मर2 लगता है।
होगी नहीं सहर लगता है।

क्यूं परवाज़3 हुई है मुश्किल,
टूट गए हैं पर लगता है।

उम्र गई है चलते-चलते,
अब रस्ता ही घर लगता है।

जिस्म नहीं ये ज़हन4 है ज़्ख्मी,
फूल भी अब पत्थर लगता है।

तुम अख़लाक5 को मिट्टी समझो,
हमको तो ज़ेवर लगता है।

आदी हूं मैं इक रहबर6 का,
तन्हा चलते डर लगता है।

जाने कैसे बिछड़ गए हम,
लग गई यार नज़र लगता है।

1– दु:ख में डूबा 2– चाँद 3– उड़ान 4– विचार (विचारधारा)
5–सद व्यवहार 6– मार्ग दर्षक


दिल के दिल ही में सारे भरम रह गए

- अनुप लखनवी -

अपनी सूरत पे थोड़े जो ख़म रह गए।
इसलिए इश्क में पीछे हम रह गए।

सबको क्या-क्या दिया तूने उम्रे रवाँ,
तुझसे लेकर हमीं बार-ए-ग़म रह गए।

पहले होती थी फूलों की बारिश जहाँ,
अब वहाँ ख़ार हैं, फूल कम रह गए।

छोड़कर चल दिए बिन कहे बिन सुने,
दिल के दिल ही में सारे भरम रह गए।

दूर हमसे हो तुम और तुमसे हैं हम,
कैसे हालात में फंस के हम रह गए।

सबको दौलत की चाहत है जैसे मिले,
मूल्य जीवन के अब कम से कम रह गए।

तीरगी, तिश्नगी, बेरूख़ी और ग़म,
इस सभी के निशाने पे हम रह गए।

बेग़रज़ दूसरों की मदद जो करें,
अब वो इन्सां कहां मोहतरम रह गए।

लिया बीबी को देवी मान


-भोलानाथ अधीर -
 
सब सुनें लगा कर कान,
लिया बीबी को देवी मान।

कहूँ क्या, हुआ बहुत हलकान, रही साँसत में हरदम जान।
हमारे टूट गये अरमान, बताओ क्या करता भगवान?
मिल गया अचानक ज्ञान, लिया बीबी को देवी मान।
पहले जब तक मैं क्वाँरा था, सब कहते हैं आवारा था।
अब ब्याह हुआ तो सास-ससुर, साली-सालों का प्यारा था।
जब मिला मुझे सम्मान, लिया बीबी को देवी मान।

थे कान पके फब्ती सहकर, क्रोधित होता था रह रहकर।
जो लोग पुकारा करते थे, अक्सर मुझको लल्लू कहकर।
अब उनके खिंचते कान, लिया बीबी को देवी मान।

बंजर-ऊसर मेरा चेहरा, लगता था बेहद डरा-डरा।
जब से पत्नी के पाँव पड़े, मैं अंदर-बाहर हरा-हरा।
लगती है गुण की खान, लिया बीबी को देवी मान।

श्रृंगार किये कुमकुम-काजल, ओढ़े चूनर पहिने पायल।
लगती है चारभुजा धारे, चिमटा, बेलन, झाड़ू, चप्पल।
भय के कारण श्रीमान, लिया बीबी को देवी मान।

उसी ने ज़ख़्म दिये


-राजीव राय-
उसी ने ज़ख़्म दिये जो भी मेरा ख़ास हुआ।
पर बहुत देर से इस बात का एहसास हुआ।

जहाँ ने दी कहाँ फुर्सत जो सोचते हम भी,
किसे मिली है ख़ुशी, कौन कब उदास हुआ।

बेवजह हमने ज़माने को बेवफ़ा समझा,
तंगहाली में भला, कौन किसके पास हुआ।

रूह के साथ, इक लाश लिये फिरता था,
दम निकलने लगा तो रूह को एहसास हुआ।

ग़म मेरा दोस्त है लेकिन ये राज़ रखता हूँ,
कब हुआ दूर मेरे कब वो मेरे पास हुआ।

सितारे कहानी सुनाने लगे हैं

सितारे कहानी सुनाने लगे हैं।
-मनीष-

नज़र की शमा को बुझाने लगे हैं।
उजाले अंधेरा बढ़ाने लगे हैं।

सफ़र ख़ाक1 में मिलने वाला है शायद,
मुसाफिर बग़ूले उड़ाने लगे हैं।

क़मर2 ने ख़ुदा जाने क्या कह दिया है,
समन्दर के लब3 थर-थराने लगे हैं।

मिरे रतजगों4 से परेशान होकर,
सितारे कहानी सुनाने लगे हैं।

ख्यालों की परवाज़5 बढ़ने लगी है,
ख़लाओं6 से पैग़ाम आने लगे हैं।

तिरा दर्द अब जाविदां7 हो चला है,
कि दिन रात हम मुस्कराने लगे हैं।

तमाशे की अब इन्तेहा हो रही है,
तमाशाई उठ-उठ के जाने लगे हैं।

1– धूल 2– चाँद 3– होंठ 4– रात्रि जागरण
5– उड़ान 6– अंतरिक्ष 7– अमर

मुझको मेरा प्यार बुलाए।

मधुमासों का पागल पंक्षी, साँझ-सुबह संगीत सुनाए।
मुझको मेरा प्यार बुलाए।

पल दो पल तुम साथ हुए थे, फिर मिलने की बात कहे थे,
पर, ये दिन तो बीत रहे हैं, क्यों बेदर्दी मुझे भुलाए?
मुझको मेरा प्यार बुलाए।

बिलख-बिलख नभी कहे कहानी, बीत रही यह भरी जवानी,
प्यासे अधरों की मत पूछो, तड़प-तड़प कर यूँ रह जाए।
मुझको मेरा प्यार बुलाए।

नभ की अनगिन दीपावलियाँ, सजतीं राहों में नव कलियाँ,
कोकिल दूर कहीं झुरमुट में, बिरहा का संगीत सुनाए।
मुझको मेरा प्यार बुलाए।

-सुबोध कुमार “सुधाकर”

भूल जाना यूँ किसी को।

याद रखना तो सहज है, प्यार उससे भी सरल है,
जिस किसी को भूलना है, पूजता हूँ मैं उसी को।
याद रखने से कठिन है, भूल जाना यूँ किसी को।

प्रहर यूँ ही बीत जाते, दिन खुशी के रीत जाते,
पर विरह में दग्ध कोकिल, याद करती है उसी को।
याद रखने से कठिन है, भूल जाना यूँ किसी को।

चाहता सब भूल जाऊँ, इस जहाँ में फिर न आऊँ,
पर हृदय की टीस बेबस, खोजती है बस उसी को।
याद रखने से कठिन है, भूल जाना यूँ किसी को।

चिर पिपासित चातकी है, पी कहाँ कह भागती है,
वर्ष भर के बाद स्वाती, नेह देता है उसी को।
याद रखने से कठिन है, भूल जाना यूँ किसी को।

-सुबोध कुमार 'सुधाकर'

तपिश

आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !

दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !

सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

तुम्हारी खामोशी

तुम हो
मैं हू¡
और एक खामोशी
तुम कुछ कहते क्यू¡ नहीं
तुम्हारे एक-एक शब्द
मेरे वजूद का
अहसास कराते हैं
तुम्हारी पलकों का
उठना व गिरना
तुम्हारा होठों में ही
मंद-मंद मुस्कुराना
तुम्हारा बेकाबू होती
सा¡सों की धड़कनें
तुम्हारे शरीर की खुशबू
तुम्हारी छुअन का अहसास
सब कुछ
इस खामोशी को
झुठलाता है।

-कृष्ण कुमार यादव

आप फिरभी मौन हैं?

जागिये, अब तो बहुत ही सो लिए।

छोडिये तन्द्रा कि उठिए, डोलिए।


दे रही दस्तक किरण है द्वार पर,

रौशनी कहती कि खिडकी खोलिए।


हादसे पर हो रहे हैं हादसे,

आप फिरभी मौन हैं कुछ बोलिए।


कैद महलों में हुई है चांदनी,

शक्ति अपने बाजुओं की तोलिए।


पालिए मत साँप अपनी जीभ में,

इन्द्रघनुषी रंग धरा पर घेलिए।


देश की तस्वीर ही होगी नयी,

साथ सब के सब अगर हैं हो लिए।


-डा0 गणेशदत्त सारस्वत

आग लग न जाय।

मधुवन में देखो कहीं आग लग न जाय।


सोने का बिरवा उगा चाँदी के अंगना।

मह-मह-मह मह कउठा केसरिया सपना।

किरनपरी सूरज की रोशनी बिखेरे,

लोहे के हाथों में खनक रहा कंगना।

सौरभ अंकोरे फूल केसर की क्यारी,

आंधियों में देखो कहीं झुलस नहीं जाय।


चंदन को घूर रहे कितने संपोलिए।

सविता पर शर ताने कितने कहेलिए।

चाहता सवेरे को लीलना अंधेरा,

कलियों को ताक रहे शूलों के भेडिए।

नखतों की झिलमिल पर ललचाए बौने

सावधान देखो कहीं दाग लग न जाय।


कुमकुम की धूल उडी नभ की डगरिया।

किरनों की डोरी से उतरी उजेरिया।

मौसमी बहारों के संग-संग खेली,

सपनों की धरती पर कंचनी नगरिया।

पूनम के द्वार जुडा चांदनी का मेला,

चंदा को देखो कही नाग डस न जाय।


बादलों को झांक रहे पौरूषी सिपहिये।

बार-बार टेर रहे कुंवर कन्हैये।

एक बूंद स्याही की मजार का छेडे,

धूमकेतुओं से भरे ताल औ तलैये।

अमृत को घेरे आज विष के वृकोदर

प्रहरी सजग, कहीं आंख लग न जाय।


-डा0 गणेशदत्त सारस्वत

गंगा निकलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।।

आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

कुहरा घना है

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है।

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों, अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।

गीत: हुआ क्या जो रात हुई

हुआ क्या जो रात हुई, नई कौन सी बात हुई?
दिन को ले गई सुख की आँधी, दु:खों की बरसात हुई।

पर क्या दु:ख केवल दु:ख है? वर्षा भी तो अनुपम सुख है।
बढ़ जाती है गरिमा दु:ख की, जब सुख की चलती है आँधी।
पर क्या बरसात के आने पर, कहीं टिक पाती है आँधी?

आँधी एक हवा का झोंका, वर्षा निर्मल जल देती।
आँधी करती मैला आँगन, तो वर्षा पावन कर देती।

आँधी करती सब उथल-पुथल, वर्षा देती हरियाला तल।
दिन है सुख तो दु:ख है रात, सुख आँधी तो दुख है बरसात।

दिन रात यूँ ही चलते रहते, थक गये हम तो कहते-कहते।
पर ख़त्म नहीं ये बात हुई।
-सीमा सचदेव

वीरान नजर आएगा

-सपन चन्दा

जब-जब इंसानी रिश्तों में दरार उभर आएगा।
तब-तब ये शहर हमें वीरान नजर आएगा।।

जब-जब मंदिर मस्जिद के मसले चौराहों पर हल होंगे
तब-तब राम और रहीम में फर्क हमको नज़र आएगा।

इंसान की इंसानियत का तब कौन देगा तकाज़ा,
जब भाई-भाई के ही खून का प्यासा बन जाएगा।

हम में हौसला है कि तूफानों का भी रूख मोड़ दें,
पर तुम्हारे शक का घेरा हमसे न तोड़ा जाएगा।

आओ सब मिलकर अपने शहर को बचालें सपन,
वर्ना मौत का साया हम पर भी छा जाएगा।।

A Hindi Poem (Ghazal) by Sapan Chanda

कितना अच्छा होता

-मोनी शंकर

कितना अच्छा होता
गर संसार में एक ही भाषा होती
एक ही धर्म होता
समाज जातियों में यूं विभक्त न होता
न इतनी भाषाएं सीखते
न इतने झगड़े होते
न खुदा को बांटना पड़ता
धरती पर रेखाएं खींचे बगैर
बिना पासपोर्ट कोई कहीं भी आ-जा सकता
मौसम बदलने पर अनुकूल जगह पर
अपनी उड़ान भर सकता
सारे सागर सांझे
सारे वृक्ष सांझे
प्रकृति का हर कण
गुरूद्वारे के लंगर की तरह सांझा
यह देश मेरा न कहकर
यह विश्व मेरा कहते
तो कितना अच्छा होता।

A Hindi Poem by Moni Shankar

केवल एक बुराई

-हास्य कविता

आज बड़ी हिम्मत करके कह पाया हूँ सच्चाई।
मेरे जीवन भर में आई, केवल एक बुराई।

जब से पैदा हुआ तभी से बिलकुल नेक रहा हूँ।
नियमपूर्वक मयखाने में मत्था टेक रहा हूँ।
दर्द न हो इसलिए रख लिया अपने पास दवाई।

थोड़ा-बहुत पढ़ा लेकिन मैं कढ़ा ज़रा कुछ ज्यादा।
नेतागीरी करने का फिर अपना बना इरादा।
चोर-लफंगों, नंगों की अब करता हूँ अगुवाई।

ऊधव का लेना, माधव का देना कहाँ गलत है।
उनकी कैसे निभे जिन्हें कर्जा लेने की लत है।
जिससे कुछ ले लिया वस्तु वह कभी नहीं लौटाई।

रिश्वत का दस्तूर पुराना है, यह नया नहीं है।
यह अधिकार समझिये इसमें कोई दया नहीं है।
लाभ मिले चाहे जिसको, मैं ले लेता चौथाई।

-भोलानाथ ‘अधीर’

A Hindi (Comedy) poem (Haasya Kavitaa) By Bholanath ‘Adheer’

जाने क्या होगा..

-मनीष

जिसके होठों पे कहकहा होगा।
उसने क्या-क्या नहीं सहा होगा।

बेहिसी1 बेसबब नहीं होती,
ज़ख़्म गहरा कोई लगा होगा।

मंजिलें दूर हैं सफ़र तन्हा,
हम जो भटके तो जाने क्या होगा।

हमसे दुनिया की बात मत करिए,
आपका लुत्फ़2 बदमज़ा3 होगा।

काम सारे ये सोचकर ही किए,
हमको अल्लाह देखता होगा।

ज़हन4-ओ-दिल पे धुंआ सा है छाया,
फिर कोई ख़्वाब जल गया होगा।

आज फिर से है शहर में रौनक,
कल कोई हादसा हुआ होगा।

1– संवेदनहीनता 2– आनन्द 3– स्वाद खराब होना 4– विचारधारा

आँखों में..

–मनीष

सहर से शाम तलक बस ग़ुबार आँखों में।
बसा हो जैसे कोई रेगज़ार1 आँखों में।।

कई सवाल कि जिनका नहीं जवाब कोई,
तड़प–तड़प के उठे सोगवार2 आँखों में।।

जो पाए हमने तलाश–ए–गुल–ए–बहारां में,
खिले हुए हैं अभी तक वो ख़ार3 आँखों में।।

शमा नज़र की इसी ख़्वाब में तमाम हुई,
कि जल उठेंगे दिए फिर हज़ार आँखों में।।

हर इक तलाश यहाँ कैसी रायागां4 गुज़री,
सजाए फिरते रहे कू–ए–यार5 आँखों में।।

किसी की याद से लिपटे वो दिल शिकन लम्हे,
लबों पे सहरा मगर आबशार6 आँखों में।।

बला की धूप, न साया न हमसफ़र कोई,
बगूले फिरते हैं अब अश्कबार7 आँखों में।।

1– रेगस्तान 2– दु:ख 3– कांटे 4– व्यर्थ
5– यार की गली 6– झरना 7– आँसुओं से भीगी

बिताना मुहाल है..

–मनीष

दामन ग़म–ए–जहाँ से छुड़ाना मुहाल है।
दो दिन की जिन्दगी को बिताना मुहाल है।

चलते हैं साथ वक़्त–ए–गुरेज़ा1 के मरहले2,
इस जिन्दगी का बोझ उठाना मुहाल है।

पहले भी कई बार मुख़ालिफ़3 रही हवा,
अब तो मगर चराग़ जलाना मुहाल है।

उस बज़्म–ए–बावक़ार4 के किस्से न पूछिए,
इस दरजा तीरगी5 थी, बताना मुहाल है।

वो दिन कि मुन्तिज़र6 थे मिरे सैकड़ों हदफ7,
अब वक़्त ये कि एक निशाना मुहाल है।

छाई है हादसात की आंधी हयात8 पर,
अब ख़्वाब के परिन्द उड़ाना मुहाल है।

वो नाख़ुदा9, वो कश्ती, वो तैराक क्या हुए,
इक डूबते नफ़स10 को बचाना मुहाल है।

ऐसी हवा चली कि मिरे ज़ख़्म छिल गए,
और टीस वो उठी कि बताना मुहाल है।

1– भूतकाल 2– समस्याएं 3– विरूद्ध 4–गौरवशाली सभा 5– अंधेरा
6– प्रतीक्षारत 7– लक्ष्य 8– जीवन 9– नाविक 10– प्राणी

जिन्दगी हमसे यूँ..

-राजीव राय

जिन्दगी हमसे यूँ कतरा के निकल जाती है।
सारी दुनिया की तरह रंग बदल जाती है।

उसने पूछा तो कई बार, मेरा हाले दिल,
ज़ुबाँ मेरी ही नामुराद फिसल जाती है।

हो अगर नेक इरादों के साथ हिम्मत भी,
भंवर को चीर के कश्ती भी निकल जाती है।

झूठे वादों के सहारे से, ये हुकूमत है,
रियाया है बड़ी मासूम बहल जाती है।

साकिया तुम ही बताओ ये माजरा क्या है,
तबियत क्यों मेरी हर शाम मचल जाती है।

A Hindi Poem (Ghazal) by Rajeev Ray

कौन ख़ुदा को याद करे

-राजीव राय

सबकुछ सबको मिल जाये गर, कौन ख़ुदा को याद करे?
दु:ख जीवन में न आये गर, कौन खुदा को याद करे?

चाहे जितना उड़ ले इन्सां पंख तो बूढ़े होने हैं,
उम्र मौत को न लाये गर, कौन ख़ुदा को याद करे?

नफ़रत और अदावत न हो, ऐसा तो नामुमकिन है,
दुनिया जन्नत हो जाये गर, कौन ख़ुदा को याद करे।

संगी साथी और जवानी, इक दिन सब खो जाते हैं,
ख़ुद को तनहा न पाये गर, कौन ख़ुदा को याद करे?

धूप ख़ुशी की आयी लेकिन, कुछ पल की मेहमान रही,
ग़म का साया न छाये गर, कौन ख़ुदा को याद करे?

A Hindi Poem (Ghazal) by Rajiv Roy

हज़ारों फूल हैं..

-राजीव राय

हज़ारों फूल हैं पर कुछ ही महक देते हैं।
फ़लक़ पे चन्द सितारे ही चमक देते हैं।

हम तो आये हैं दुनिया में मुसाफिर बनकर,
जाने क्यों लोग ठहरने का सबक़ देते हैं।

ग़ुरूर हुस्न का उनको भी न आये क्यों कर,
बहार बन के वो फूलों को महक देते हैं।

जिनका ईमान सरे–आम बिका करता है,
हमको ईमान पे चलने का सबक़ देते हैं।

हमने जज़्बात को रिश्तों से बचाया लेकिन,
बन गये फिर वही रिश्ते जो कसक देते हैं।

A Hindi Poem (Ghazal) by Rajiv Ray

क़ातिल हुई है..

-अनुप लखनवी
ये दुनिया इस तरह क़ाबिल हुई है।
कि अब इन्सानियत ग़ा‍फिल हुई है।

सहम कर चाँद बैठा आसमां पर,
फ़ज़ाँ तारों तलक क़ातिल हुई है।

ख़ुदाया माफ़ कर दे उस गुनह को,
लहर जिस पाप की साहिल हुई है।

बड़ी हसरत से दौलत देखते हैं,
जिन्हें दौलत नहीं हासिल हुई है।

जहाँ पर गर्द खाली उड़ रही हो,
वहाँ ग़ुरबत की ही महफिल हुई है।

A Hindi Poem (Ghazal) by Anoop Lakhnavi

जीवन के इस सफ़र में..

-अनुप लखनवी

जाना अगर तुम्हें है सोने के इक नगर में।
चलना ज़रूर होगा कांटों भरी डगर में।

यह भी नहीं है अच्छा हर दर्द की दवा हो,
कुछ रंज हैं ज़रूरी जीवन के इस सफ़र में।

वो था मेरा मुख़ालिफ़ मुझको न ये ग़ुमाँ था,
बारूद धर वो देगा मेरे हर इक शरर में।

वो गर सियासती हैं इतना पता तो होगा,
कब-कब चुनाव होगा इस गाँव उस नगर में।

यह इश्क भी ख़ता है मैंने ये तब ही जाना,
बदनाम हो गया जब हर इक गली नगर में।

तुम दोष ढ़ूंढ़ते हो क्यूंकर ‘अनूप’ सबमें,
इतने बड़े जहाँ में हैं दोष हर बशर में।

A Hindi Poem (Ghazal) by Anup Lakhnavi

हाँ जी-हाँ जी

हास्य कविता

मुँह पर बोलो ददुआ-ददुआ, पीछे चाहे पाजी।
इस जंगल में रहना है तो, बोलो हाँ जी-हाँ जी।

कानूनी अब राज कहाँ है, राम भजो।
जिसकी लाठी भैंस उसी की, क्यों महतो?

किसमें दम जो बाहुबली की झेलेगा नाराजी।
इस जंगल में रहना है तो, बोलो हाँ जी-हाँ जी।

छोटी मछली बड़ी जात का चारा है।
सीधा-सादा दाँव-पेंच से हारा है।

भयमुक्त रहेंगे सब, यह नारा कोरा लफ़्फ़ाजी।
इस जंगल में रहना है तो, बोलो हाँ जी-हाँ जी।

चोरी वाली रपट रखी जिसके आगे।
राखी के बंधवाये हैं वे खुद धागे।

पाप बढ़ा इस ओर उधर मैली होती गंगाजी।
इस जंगल में रहना है तो, बोलो हाँ जी-हाँ जी।

अब भी कहतीं परी-कथायें दादीजी।
उम्मीदों पर दुनिया जीती तू भी जी।

अगली सदी और बदतर है, चलो लगा लो बाजी।
इस जंगल में रहना है तो, बोलो हाँ जी-हाँ जी।

-भोलानाथ ‘अधीर’

A Hindi poem (Hasya Kavita) By Bholanath ‘Adheer’

डरता नहीं हूँ

हास्य कविता

मैं तो बस काम करता नही हूँ।
वैसे मेहनत से डरता नहीं हूँ।

खेत लूँ, मेड़ बाँधूं, जुताई करूँ, बीज ढ़ूँढ़ूँ, करूँ फिर बुआई।
टकटकी बाँधकर फिर तकूँ आसमाँ, हो न बारिश करूँ फिर सिंचाई।

फिर कटाई-मड़ाई का झंझट करूँ, व्यर्थ इसमें उतरता नहीं हूँ।
वैसे मेहनत से डरता नहीं हूँ।

पहले भटकूँ सड़क पर इधर या उधर, कोई खोखा या दूकान पाऊँ।
फिर भरूँ उसमें कुछ, फिर नुमाइश करूँ, फिर इशारों से ग्राहक बुलाऊँ।

उनसे सौदा करूँ, यानी किचकिच करूँ, मतलबी भाव भरता नहीं हूँ।
वैसे मेहनत से डरता नहीं हूँ।

नौकरी में फँसूं तो भी गड़बड़ बड़ी, चापलूसी करूँ, जी हुजूरी।
कोई मस्ती करे, कोई कुछ मत करे, किन्तु हमको तो खटना ज़रूरी।

कोई शिकवा करूँ तो बुराई मिले, मैं यहाँ भी ठहरता नहीं हूँ।
वैसे मेहनत से डरता नहीं हूँ।

सोचा नेता बनूँ, पेशा अच्छा मगर, कम्प्टीशन बहुत बढ़ गया है।
जब से जनता में है जागरण आ गया, भाव उनका बहुत चढ़ गया है।

एक वोटर दिखे, झूठे वादे करूँ, मैं वचन से मुकरता नहीं हूँ।
वैसे मेहनत से डरता नहीं हूँ।

-भोलानाथ ‘अधीर’

A Hindi poem (Hasya Kavita) By Bholanath ‘Adheer’

सुन रहा था

-अरविंद ‘असर’

सुन रहा था कि जग अब सुखी हो गया।
किन्तु देखा उसे जब, दु:खी हो गया।।

राज़े-दुनिया समझने चला था कभी,
जानकर राज़ अन्तर्मुखी हो गया।

अब किसी बात का कुछ भी मतलब नहीं,
जो भी चुनकर गया दो-मुखी हो गया।

हर घड़ी है नज़र बस उसी की तरफ,
अब वो सूरज मैं सूरजमुखी हो गया।

ताप कष्टों का इतना बढ़ा आज-कल,
सारा संसार ज्वालामुखी हो गया।

पल खुशी के बहुत दे गया जो ‘असर’,
याद उसकी जो आई दु:खी हो गया।

A Hindi Poem (Ghazal, Gazal) by Arvind 'Asar'

कुछ भी नहीं है

-अरविंद ‘असर’

सद शुक्र कि अब मुझको तलब कुछ भी नहीं है।
उलझन है मगर इसका सबब कुछ भी नहीं है।।

दर अस्ल अगर देखो तो है इल्म की तंगी,
मैं कहता हूँ दुनिया में अजब कुछ भी नहीं है।

कुछ ऐसे भी प्लेनेट हैं कि उगता नहीं सूरज,
इक शब जो यहाँ की है वो शब कुछ भी नहीं है।

हर दौर में ये बात बुज़ुर्गों ने कही है,
इस दौर में तहज़ीबो-अदब कुछ भी नहीं है।

कुछ बात अगर दिल में नहीं किसलिए फिर आप,
कुछ ढ़ूंढ़ूते हैं राख में जब कुछ भी नहीं है।

जब आई मुसीबत तो उसे करने लगे याद,
वो लोग जो कहते थे कि रब कुछ भी नहीं है।

हाथों में लकीरें हैं बहुत फिर भी ‘असर’ तुम,
कहते हो मेरे हाथ में अब कुछ भी नहीं है।

A Hindi Poem (Ghazal) by Arvind 'Asar'

अच्छा लगता है

-डा0 हरिराज सिंह ‘नूर’

आँचल में मुँह रखकर रोना अच्छा लगता है।
अपने आप को तुझमें खोना अच्छा लगता है।

वो दीवाना कहलाता है दुनिया में जिसको,
अपने हक़ में काँटे बोना अच्छा लगता है।

तेरे - मेरे बीच हमेशा रहती है दूरी,
पर तेरे नज़दीक भी होना अच्छा लगता है।

हर महफिल में हंस लेता हूँ सबके साथ मगर,
पलकें तेरे ग़म में भिगोना अच्छा लगता है।

चुपके-चुपके ‘नूर’ बहाकर आँसू आँखों से,
अपने ज़ख़्मों को यूँ धोना अच्छा लगता है।

A Hindi Poem (Ghazal) by Hariraj Singh 'Noor'

कोई शिकवा अब नहीं

-अरविंद ‘असर’

कोई शिकवा अब नहीं है राम से।
कट रही है जिन्दगी आराम से।।

नाम सबका प्यार से लेते हैं वो,
चिढ़ उन्हें है बस हमारे नाम से।

मुझको है रब पर भरोसा इसलिए,
मैं नहीं डरता किसी इल्‍ज़ाम से।

तुमसे मिलने के लिए आया हूँ मैं,
तुमको फुर्सत ही नहीं है काम से।

और ही कुछ हो जतन मेरे लिए,
मैं नहीं होता हूँ ख़ुश इनआम से।

क्यों डराते हो हमें अब दोस्तो,
हम हैं वाकिफ़ इश्‍क़ के अंजाम से।

इसके आगे क्या बताऊँ मैं ‘असर’,
"दिल बुझा रहता है अक्सर शाम से"।


A Hindi Poem (Ghazal) by Arvind 'Asar'

मुझे तोल रहा है

-अरविंद ‘असर’

वो आँखों ही आँखों में मुझे तोल रहा है।
लब उसके हैं ख़ामोश मगर बोल रहा है।

मैं जानता हूँ हिर्सो-हवस हैं बुरे फिर भी,
मैं देख रहा हूँ मेरा मन डोल रहा है।

अब देखो वो भी मुल्क पढ़ाता है हमें पाठ,
जिसका न कुछ इतिहास न भूगोल रहा है।

मुद्दत हुई है फिर भी तेरे प्यार का वो बोल,
कानों में मेरे आज भी रस घोल रहा है।

ईमान का तो मोल ही अब कुछ भी नहीं है,
वैसे ये कभी मुल्क में अनमोल रहा है।

शायद वो किसी और ही ग्रह का है निवासी,
जो सबसे बड़े प्यार से हंस-बोल रहा है।

ग़ैरों के ‘असर’ राज़े-निहाँ मुझको बताकर,
वो अपना ही ख़ुद राज़े-निहाँ खोल रहा है।

A Hindi Poem (Ghazal) by Arvind 'Asar'

ताश के पत्ते

-अहसन

हम आदमी थे ही कहाँ
बस फ़क़त ताश के पत्ते थे
कभी कुर्सियों की जंग में लड़ने के लिये
कभी कुर्सियों की तक़सीम की खातिर
कभी किसी के अहम की तस्कीन की खातिर, और
कभी किसी की दिल्लगी और दिलजोई की खातिर
हम तो बस
ताश के पत्तों की तरह फेंटे गये
कभी काटे गये, कभी बाँटे गये
कभी पलट कर रखे गये
कभी उलट कर देखे गये
कभी हम मुस्तकिल गड्डी से
अलग करके रखे गये
कभी हम बोली पर चढ़े
कभी हम दाँव पर खेले गये
जब जहाँ मौक़ा लगा
हमको आज़माया गया
अगर बेकाम निकले तो
हिक़ारत से ठुकराये गये
हम तो बस ताश के पत्ते थे
कभी पपलू के खिताब से नवाज़े गये
कभी जोकर कभी टिटलू बनाये गये
कभी हम किसी के ट्रम्प थे,
तो कभी सिर्फ जोकर की मानिन्द उछाले गये
अगर फिर भी न रास आये तो
गड्डी में फिर से फेंटे गये।
हम तो आदमी थे ही कहाँ
बस फ़क़त ताश के पत्ते थे।

A Hindi Poem (Nayi Kavita) by Ahsan

मरना चाहते हैं

-राजकुमार जैन ‘राजन’

हम इन अंधी गलियों में
अकेले भटक रहे हैं
भयाक्रान्त/अजनबी
और अकेले।
अंधेरे में
एक खूनी पंजा हमारी ओर बढ़ता है
और गर्म लहू से
हमारे माथे पर लिख जाता है ‘नास्तिक’
हम बेबसी में छटपटाते हैं
बागी कबूतर की तरह पंख फड़फड़ाते हैं
गंदी हवा हमारी सांसों में दम तोड़ती है
जिन्दगी जोंक बनकर चूसती है
भावनाएं रद्दी की तरह टके सेर बिकती हैं
अनास्था का विष हमारी आंखों में उबलता है
और
अपने कंधों पर अपना सलीब उठा
हम समानान्तर चोटियों पर चढ़ते हैं
पीड़ा से कराहते हैं
और
मरने से पहले मरना चाहते हैं।

A Hindi Poem (Nayi Kavita) by Rajkumar Jain 'Rajan'

आज प्रिये तुम गीत सुनाओ

-अखिलेश निगम ‘अखिल’

मन मे मन के तार मिलाओ।
आज प्रिये तुम गीत सुनाओ।

मधुर मिलन की मधुमय आशा। मूक नयन की चंचल भाषा।
मिलन-विरह को अपना स्वर दो, आज रचो मिल नव परिभाषा।
उर से उर की ज्योति जगाओ। आज प्रिये तुम गीत सुनाओ।

उठना, गिरना, गिरकर उठना। चंचल चितवन से सब कहना।
ज्वार उठाती मन-सागर में, विरह व्यथा अब कैसे सहना।
कुछ पल मेरे संग बिताओ। आज प्रिये तुम गीत सुनाओ।

रक्तिम अधर सोमरस प्यारे। रहते मौन मस्त मतवाले।
मौन मुखर अब आज करो तुम, विरह-सर्प हैं काले-काले।
अधर-अमीरस पान कराओ। आज प्रिये तुम गीत सुनाओ।

अन्त:करण न रोने पाये। मन का भाव न खोने पाये।
कुछ भी ऐसी युक्ति करो तुम, मिलन बिछोह न होने पाये।
मन के घावों को सहलाओ। आज प्रिये तुम गीत सुनाओ।

A Hindi Poem (Geet) by Akhilesh Nigam 'Akhil'

सीली हुई लकड़ी

-पवन कुमार जैन

सीली हुई लकड़ी
जलती नहीं
केवल सुलगकर धुआं देती है।
लकड़ी में छिपी हुई
पानी की चंद बूंदें
उसके मौलिक गुण
प्रज्जवलन को, रोक देती हैं
और मजबूर करती हैं
कि वह जलकर
न तो रोटी बनाए
और न ही चिता जलाए
बल्कि आग को
धुएं में बदलकर, आंखों में घुसकर
लोगों को सुख देने की बजाए
बेवजह रूलाए।
लकड़ी का पानी से
असमय मिलन
उसे अपनों से
अलग कर देता है।
उसके अपने
यह सूखी लकडियां
रोटी पकाकर, चिता जलाकार
अपनी अस्मिता साकार कर
धू-धू कर खुश होती हैं।
जबकि सीली हुई लकड़ी
अपने अंदर घुसे पानी को
आँसू बनाकर
बाहर निकालने का
करती रहती है अथक प्रयास।

A Hindi Poem (Nayi Kavita) by Pawan Kumar Jain

भीड़

–सुरेश उजाला

भीड़–
खुश रहती है
उत्सव–पर्व
आयोजनों में

भीड़–
खामोश हो जाती है
गम–दु:ख
दर्द में

भीड़–
उग्र हो उठती है
समस्या–आंदोलन
जनहित
और उसके समाधान में

लेकिन–
भीड़
जब भाड़ बनती है–
तो ईंधन के पास
कोई तर्क नहीं होता
सिवा जलने के।

A Hindi Poem (Nayi Kavita) by Suresh Ujala

प्रतीक्षा

-ज़ाकिर अली 'रजनीश'

रूप तुम्हारा देखूं मन में केवल इतनी इच्छा।
टूट रहे हैं बांध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा।

नयन राह पर लगे हुए हैं हटती नहीं निगाहें।
कब तुमसे मिलवाएंगी मुझको ये सूनी राहें।

और अभी कब तक देनी है मुझको कठिन परीक्षा।
टूट रहे हैं बांध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा।

मन मछली सा तड़प रहा कब पाएगा ये राहत।
कानों में रस घोलेगी कब तेरे स्वर की आहट।

दीन हुआ जाता मैं प्रतिपल भाती कोई न शिक्षा।
टूट रहे हैं बांध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा।

आओ प्रिय कैसे भी टूटे न ये मेरी आशा।
मन की प्यास बुझाओ पूरी कर दो हर अभिलषा।

मांग रहा हूं तुमसे मैं सानिध्य लाभ की भिक्षा।
टूट रहे हैं बांध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा।

A Hindi Poem (Geet) by Zakir Ali 'Rajneesh'

चाहता मैं नहीं..

-वाहिद अलीवाहिद

चाहता मैं नहीं था शहर में रहूँ ।
कामना थी मेरी गाँव, घर में रहूँ ।

रोटियों ने दिखा दी नगर की डगर,
किस तरह दोस्तों की नज़र में रहूँ।

अर्थ, यश, नाम की भावना को लिए,
अब नियति बन गयी है सफ़र में रहूँ।

गालियाँ दे रहे, उनकी चर्चा बहुत,
गीत गाकर कहाँ तक ख़बर में रहूँ।

शब्द – संघर्ष करते हुए जी सकूँ,
इसलिए चाहता हूं, भंवर में रहूँ।

गीत में जो रहूँ, छन्द, सुर ताल में,
या ग़ज़ल में रहूँ तो बहर में रहूँ।

सत्य का शंख ‘वाहिद’ मेरे हाथ में,
मैं भला क्यों किसी के असर में रहूँ।

A Hindi Poem (Ghazal) by Wahid Ali 'Wahid'

यादों की एक हाट

-देवकी नन्दनशान्त

यादों की एक हाट सी, लगती है शाम से।
बिकते हैं मेरे ग़म जहां गीतों के नाम से।

मैं उसको ढ़ूंढ तो लूँ मगर कुछ पता चले,
आवाज़ उसने दी है मुझे किस मक़ाम से।

केवल खुशी को बढ़ के लगाया नहीं गले,
मैं ग़म से भी मिला हूं बड़े एहतराम से।

मैं जिन्दगी के मोड़ पे पहुँचा कि तू मिला,
घर से चला था वैसे किसी और काम से।

रहता हूँ शान्त हर घड़ी गम के नशे में चूर,
मुझको कहाँ है वास्ता मीना ओ जाम से।

A Hindi Poem (Ghazal) by Devki Nandan 'Shant'

गुरूदक्षिणा

-रमेश चन्द्र पाल

बुद्धिहीन की बुद्धि से
गुरू गये चकराए।
तू कैसा शिष्य है
मेरी समझ न आए ।
नाम मेरा तू बोरेगा
लक्षण रहे दिखाए।
अब तू पारंगत हो गया
घर में बैठो जाए।
शिक्षा तेरी पूर्ण हुई
मेरी ज़रूरत नाए।
पर गुरूदक्षिणा के वास्ते
एक वचन दई जाए।
जब कोई पूछे नाम गुरू को
मेरो नाम न आए।।

A Hindi Poem (Hasya Kavita) by Ramesh Chandra Pal

दर्पण चकनाचूर हो गया

-डा० लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’

दर्पण चकनाचूर हो गया।
मन में तुम्हें बसाकर भी मैं तुमसे इतना दूर हो गया।

बिखर गये प्रतिबिम्ब तुम्हारे, एक रूप-शशि अगणित तारे।
मिलन-साँझ का क्षितिज सुनहरा, ऊषा का सिन्दूर हो गया।
मन में तुम्हें बसाकर भी मैं तुमसे इतना दूर हो गया।।

प्यार बरसता सावन-घन बन, रूप-सुधा में है पागलपन।
खोकर पाना, पाकर खोना, दुनिया का दस्तूर हो गया।
मन में तुम्हें बसाकर भी मैं तुमसे इतना दूर हो गया।।

दृग मृग से ये भोले-भाले, लगे पंचशर की द्युति वाले।
ऐसे गड़े कि घायल मन भी, मधु-रस से भरपूर हो गया।
मन में तुम्हें बसाकर भी मैं तुमसे इतना दूर हो गया।।

A Hindi Geet by Dr. Laxmishankar Mishr 'Nishank'

मैंने एक किरन माँगी थी

-डा० लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’

मैंने एक किरन माँगी थी, तुमने नील गगन दे डाला।
मैंने दो मधु-कण माँगे थे तुमने सावन-घन दे डाला।

स्वप्न सजा भीगी पलकों पर, मन में क्वाँरी पीर बसाकर।
साधों के मन्दिर में बैठा, आशा का लघु दीप जलाकर।

एकाकीपन खले न मन को, रूप तुम्हारा छले न मन को,
मैंने मधुर मिलन माँगा था, तुमने यह बन्‍धन दे डाला।

विस्मृति की मधुमय घडियों में, मादक सपने लगे सुहाने।
पुलक उठीं मन की आशाएँ, स्वप्न लगे श्रृंगार सजाने।

गीतों की वंशी के स्वर में, पीर न अंतर की सो जाए,
मैंने अपनापन माँगा था, तुमने पागलपन दे डाला।

तुमको पाकर लगा कि मेरा माधव ही मुझमें मुसकाया।
तुम रूठे तो लगा कि मेरा पीड़ा से अंतर भर आया।

फैले सुख की मधुर चाँदनी, मिलन-यामिनी युग बन जाए,
मैंने तो यौवन तो माँगा था, तुमने यह दर्शन दे डाला।

A Hindi Geet by Dr. Laxmishankar Mishr 'Nishank'

ख़ूब शान से

-डा0 दिनेश चन्द्र अवस्थी

जीनी है जिन्दगी तो, जियो ख़ूब शान से।
करना है कोई काम, करो ख़ूब शान से।

बनता है स्वर्ग वहाँ, जहाँ होती रिहाइश,
इसलिए रहो जहाँ, रहो ख़ूब शान से।

है बात ही ईमान-धर्म, आन-बान भी,
इसलिए करो बात, करो ख़ूब शान से।

जिससे भी करो दोस्ती, वो कम कभी न हो,
दुश्मन भी गर बनो तो, बनो ख़ूब शान से।

जिन्दगी में झंझटें आयेंगी रोज़-रोज़,
हर हाल में तुम डटे रहो, ख़ूब शान से।

दुख-दर्द तो जीवन के साथ-साथ रहेंगे,
तुम चलते उसूलों पे रहो, ख़ूब शान से।

हर आदमी में कमियाँ होनी हैं लाजिमी,
इनको सदा स्वीकार करो, ख़ूब शान से।

A Hindi Ghazal by Dr. Dinesh Chandra Avasthi